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आजादी से पहले और बाद सिनेमा और सेंसरशिप की यात्रा कराती पुस्तक 'सेंसरशिप के 100 वर्ष'

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डॉ. जैसल की नई पुस्तक- 'सेंसरशिप के 100 वर्ष' - फोटो : Twitter@ManishJaisal
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सिनेमा के विकासक्रम में अलग-अलग काल मे यह यह प्रश्न उठता रहा है कि फिल्म में क्या दिखाया जाना चाहिए और क्या नही? सिनेमा समाज का अभिन्न अंग माना जाता है लेकिन यह भी सच है कि उन्हीं दृश्यों, संवादों और कहानी का जब सिने पट पर चित्रण होता है तो आपत्तियां भी उठने लगती है। इस संदर्भ में 100 वर्षों के सिनेमा और सेंसरशिप के इतिहास में अंग्रेजी हुकूमत से लेकर मौजूदा भारत सरकार की कार्यप्रणाली देखी जाए तो कई सारे सवाल उठना लाजमी है। 

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सेंसरशप फिल्मों के प्रमाण प्रक्रिया से लेकर फिल्म प्रमाणन बोर्ड में शामिल सदस्यों की अर्हताओं पर खुल कर कभी बात नहीं हुई। अलग-अलग सरकारों ने समितियां बनवाई और उनकी रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी गई। साल 2016 में श्याम बेनेगल की कमेटी की रिपोर्ट को भी इसी संदर्भ में समझने की दरकार है। इस विषय पर समझ बढ़ाने का काम करती है, डॉ. मनीष जैसल की नई पुस्तक- 'सेंसरशिप के 100 वर्ष'। 

डॉ. जैसल ने पांच साल से अधिक समय तक इस विषय पर शोध कर विषय विशेषज्ञों और जानकारों की मदद से इस पुस्तक में उन्हीं सवालों के जवाब दिए हैं, जो सेंसरशिप की परिधि में आते हैं। अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यमों में लगाई जाने वाली सेंसरशिप के अलावा अमेरिका, यूरोप और एशियाई देशों की फिल्म सेंसरशिप नीति, प्रक्रिया और ऐतिहासिक परिपेक्ष्य पर पैनी नजर डाली है। 

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पुस्तक के दूसरे भाग में सेंसरशिप के न्यायिक और सामाजिक चिंतन के साथ भविष्य में इसकी प्रासंगिकता पर बात करते हुए डॉ. जैसल ने साल 2000 के बाद की चयनित फिल्मों का विषयवस्तु विश्लेषण किया है। बुक बजुका प्रकाशन, कानपुर द्वारा दो भागों में प्रकाशित यह पुस्तक अपने आप में सेंसरशिप और सिनेमा पर एक समग्र की तरह है, जिससे मीडिया, सिनेमा और संबद्ध विषयों के छात्र, शोधार्थी, अध्यापक और प्रोफेशनल साधक लाभान्वित होंगे। 

लंबे समय से मीडिया के प्रिंट और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर सिनेमा और संबद्ध समसामयिक विषयों पर लिख रहे डॉ. मनीष जैसल की यह दूसरी पुस्तक है। इससे पहले उनकी पुस्तक 'मुजफ्फर अली: फिल्मों का अंजुमन' भी खूब पसंद की गई है। डॉ. जैसल वर्तमान में मंदसौर विश्वविद्यालय के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष और सहायक प्रोफेसर हैं।

वह फिल्म राइटर्स एसोसिएशन के भी सदस्य हैं। फिलहाल वह नेहरु मेमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी, नई दिल्ली के सहयोग से पूर्वोत्तर राज्यों के सिनेमा और राजनीति पर पुस्तक लिख रहे हैं।
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