पुस्तक के दूसरे भाग में सेंसरशिप के न्यायिक और सामाजिक चिंतन के साथ भविष्य में इसकी प्रासंगिकता पर बात करते हुए डॉ. जैसल ने साल 2000 के बाद की चयनित फिल्मों का विषयवस्तु विश्लेषण किया है। बुक बजुका प्रकाशन, कानपुर द्वारा दो भागों में प्रकाशित यह पुस्तक अपने आप में सेंसरशिप और सिनेमा पर एक समग्र की तरह है, जिससे मीडिया, सिनेमा और संबद्ध विषयों के छात्र, शोधार्थी, अध्यापक और प्रोफेशनल साधक लाभान्वित होंगे।
लंबे समय से मीडिया के प्रिंट और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर सिनेमा और संबद्ध समसामयिक विषयों पर लिख रहे डॉ. मनीष जैसल की यह दूसरी पुस्तक है। इससे पहले उनकी पुस्तक 'मुजफ्फर अली: फिल्मों का अंजुमन' भी खूब पसंद की गई है। डॉ. जैसल वर्तमान में मंदसौर विश्वविद्यालय के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष और सहायक प्रोफेसर हैं।
वह फिल्म राइटर्स एसोसिएशन के भी सदस्य हैं। फिलहाल वह नेहरु मेमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी, नई दिल्ली के सहयोग से पूर्वोत्तर राज्यों के सिनेमा और राजनीति पर पुस्तक लिख रहे हैं।