रोजगार सृजन देश के लिए प्राथमिकता
वहीं, एनआरडीसी के इंडिया प्रोग्राम डायरेक्टर समीर क्वात्रा का कहना है कि भारत की अक्षय ऊर्जा से जुड़ी अभूतपूर्व यात्रा एक नया प्रतिमान गढ़ सकती है कि कैसे देश वातावरण में कार्बन उत्सर्जन को बढ़ाए बगैर अपनी समृद्धि के लिए प्रयास कर सकते हैं। 30 वर्ष से कम आयु की लगभग 70 करोड़ की आबादी के साथ, स्वच्छ भविष्य के लिए रोजगार सृजन देश के लिए प्राथमिकता है। अक्षय ऊर्जा के जरिए अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने से न केवल ऊर्जा स्वतंत्रता बढ़ेगी, बल्कि कार्बन उत्सर्जन और वायु प्रदूषण से भी बचा जा सकेगा। यह भारत के रोजगार संबंधी लक्ष्यों को भी पूरा करने में मदद करेगा। अब अक्षय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों और भविष्य के लिए कौशल विकास में निवेश करने का वक्त है।
प्रशिक्षण पाठ्यक्रम को अपडेट करने की जरूरत
एससीजीजे के सीईओ डॉ. प्रवीण सक्सेना के मुताबिक, आने वाले वर्षों में अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में सृजित होने वाली रोजगार संभावनाओं का लाभ उठाने के लिए एक कुशल कार्यबल की उपलब्धता बहुत महत्वपूर्ण है। स्वच्छ ऊर्जा कौशल विकास कार्यक्रमों को ग्रामीण क्षेत्रों को लक्षित करना चाहिए और उद्योग की जरूरत पूरी करने के लिए उनके प्रशिक्षण पाठ्यक्रम को समय-समय पर अपडेट किया जाना चाहिए। बैटरी और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी उभरती हुई प्रौद्योगिकियों के बारे में प्रशिक्षित करना भी महत्वपूर्ण है, ताकि उनकी तैनाती को तेज करने के लिए एक कुशल कार्यबल उपलब्ध हो सके।
बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने पर दें ध्यान
सीईईडब्ल्यू-एनआरडीसी-एससीजीजे के अध्ययन में यह भी सुझाव दिया गया है कि भारत को सोलर सेल और सोलर पैनल के घरेलू विनिर्माण में सुधार करते हुए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक बड़ी भूमिका निभाने की दिशा में ध्यान देना चाहिए। सरकारों को परिवर्तनशील अक्षय ऊर्जा के उच्च स्तरों को शामिल करने के लिए ग्रिड के बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने पर ध्यान देना चाहिए। ये सहायक क्षेत्र रोजगार के अतिरिक्त अवसरों को पैदा करेंगे।
आठ वित्तीय वर्षों में 34 लाख नौकरियां
नवंबर 2021 में ग्लासगो में आयोजित कॉप-26 में, भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता स्थापित करने और अक्षय ऊर्जा स्रोतों से अपनी 50 प्रतिशत बिजली का उत्पादन करने का वादा किया है। बिजली उत्पादन के लिए ज्यादातर नई क्षमता सौर और पवन ऊर्जा पर केंद्रित रहने की संभावना है। अगर भारत अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा कर पाया तो ये दोनों ही क्षेत्र संभावित रूप से अगले आठ वित्तीय वर्षों में 34 लाख नौकरियां पैदा कर सकते हैं, जिससे 10 लाख लोगों को रोजगार मिल सकेगा। किसी भी प्रोजेक्ट में सृजित नौकरियां और आवश्यक कार्यबल में अंतर होता है, क्योंकि एक व्यक्ति एक से अधिक पद व कार्य को संभाल सकता है।
नौकरियां बनाम कार्यबल (वर्कफोर्स) में अंतर ऐसे समझें
वर्ष 2015 में सीईईडब्ल्यू-एनआरडीसी-एससीजीजे ने अपनी रिपोर्ट ‘क्लीन एनर्जी पॉवर्स लोकल जॉब ग्रोथ इन इंडिया’ में अनुमान लगाया था कि अगर ग्रिड कनेक्टेड सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा दिया जाए तो 2015 और 2022 के बीच सौर विनिर्माण श्रमिकों, इंस्टॉलरों, रखरखाव कार्यों, इंजीनियर, टेक्नीशियन और प्लांट ऑपरेटर्स के लिए कुल 10 लाख नौकरियां सृजित हो सकेंगी। इनमें व्यवसाय विकास, डिजाइन और पूर्व-निर्माण, और निर्माण व उसे चालू करने जैसी लघु-अवधि की नौकरियों के साथ-साथ संचालन व रखरखाव और प्रदर्शन की निगरानी जैसी दीर्घकालिक नौकरियां शामिल हैं।
उदाहरण के लिए, मान लिया जाए कि देश ने पहले साल में 1500 श्रमिकों के कार्यबल के साथ पांच गीगावाट की क्षमता स्थापित की और दूसरे वर्ष में अतिरिक्त 15 गीगावाट क्षमता स्थापित करने की योजना है। ऐसे में मौजूदा 1,500 कर्मचारी, जो पांच गीगावॉट क्षमता स्थापित करने के लिए पहले ही प्रशिक्षित किया जा चुके है, के अलावा शेष 10 गीगावॉट क्षमता के लिए 3000 अतिरिक्त नए कर्मचारियों की ही जरूरत पड़ेगी। इसलिए, दूसरे साल में जरूरी कार्यबल में सिर्फ 3,000 नए कर्मचारी ही शामिल हैं।