"धरती हमारी। ये जंगल-पहाड़ हमारे। अपना होगा राज। किसी का हुकुम नहीं। और ना ही कोई टैक्स-लगान या मालिकान। हमारे पुरखे इन्हीं उसूलों को लेकर अंग्रेजों और जमींदारों के खिलाफ लड़ते रहे। अब किसी ने कोई दूसरी धरती अलग से तो नहीं बनाई जो हम सरकार को लगान दें।" सुका टाना भगत स्थानीय लहजे में यह कहते हुए अपने पुरखे जतरा टाना भगत की मूर्ति को एकटक निहारते हैं। हमने सुका टाना से यही पूछा था कि आखिर लगान क्यों नहीं देना चाहते और इसके लिए इतनी लंबी लड़ाई हुई कैसे? दरअसल, झारखंड में आदिवासी समुदाय के टाना भगतों का साल 1956 से बकाया लगान माफ कर दिया गया है। माफी की यह राशि 61 लाख 63 हजार 209 रुपए है। अब आगे टाना भगतों की जमीन को लेकर सरकार टोकन के तौर पर सिर्फ एक रुपए का सेस लेगी। इस बारे में सरकार के राजस्व निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग ने संकल्प जारी कर दिया है। साथ ही आवश्यक कार्रवाई के लिए संबंधित जिलों के अपर समाहर्ताओं को हाल ही में पत्र भेजा गया है। साथ ही जिलों के उपायुक्तों से टाना भगतों के विकास के लिए ठोस कदम उठाने को कहा गया है।
सुका टाना भगत झारखंड में बेड़ो ब्लॉक के खकसी टोली गांव के रहने वाले हैं। जंगलों-पहाड़ों से घिरे इस गांव में टाना भगतों के 30 परिवार हैं। गरीबी में जीना, पर कर्म और वचन के पक्के। पुरखों के साथ तिरंगा और अहिंसा के पुजारी। गांधी को जीने वाले। बेहद सरल और सहज। टाना भगतों की यही पहचान है। झारखंड में मुख्य तौर पर ये लोग रांची, लातेहार, लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा, खूंटी और चतरा जिले के दूरदराज के गांवों में बसे हैं। सुबह हम जब खकसी टोली पहुंचे तो कच्ची गलियों में लोगों की आवाजाही कम थी। पता चला बहुत से लोग खेत-खलिहान चले गए हैं। गांव में जतरा टाना भगत की मूर्ति लगी है। यहीं पर सुका टाना भगत के साथ कुछ और लोग प्रार्थना करते मिले। जतरा और तुरिया टाना भगत जैसे वीर पुरखे इस समुदाय के दिलों में बसते हैं।
इंतजार करेंगे
सरकार की ओर से लगान माफी को लेकर जारी आदेश के बारे में जानकारी देने पर सुका और एतवा टाना एक साथ बोल पड़ेः सुना तो है, पर हाथ में कागज मिलने तक वे इंतजार करेंगे। आखिर सरकार का फैसला, कागज मिलने के बाद ही पता चलेगा। क्योंकि पहले भी सरकार और अफसर कई किस्म का भरोसा दिलाते रहे हैं। लगान माफी के साथ जमीन पर उनका हक हो इसलिए वह कागज चाहते हैं। हालांकि, सरकार ने पत्र के हवाले से स्पष्ट कहा है कि एक रुपए सेस वसूली के साथ रसीद जारी की जाएगी ताकि टाना भगतों की पहचान बनी रहे। टाना भगतों को इसका भी दुख है कि अपने समुदाय के लोग संघर्ष दशकों से कर रहे हैं पर वे भी संघ-संगठन और जिले के नाम पर बंटते रहे हैं। सुका का कहना था कि मुख्यमंत्री ने बातें अच्छी की हैं, देखिए काम कितना होता है। अखिल भारतीय टाना भगत संघ सोनचिपि के अध्यक्ष झिरगा टाना भगत भी सुका की बातों की तस्दीक करने के साथ कहते हैं कि लगान माफी और सेस को लेकर सरकार ने जो संकल्प जारी किया है उस पर किस किस्म की कार्रवाई होती है, यह देखना बाकी है। उन्हें जमीन माफी की रसीद भी नहीं दी जाती रही है जिसकी मांग पुरानी हो चुकी है।
बाकी है लड़ाई
सुका टाना कहते हैं कि अंग्रेजों ने उनकी जमीन नीलाम कर दी थी उसे लौटाने के लिए और वन पट्टा हासिल करने के लिए वे लोग संघर्ष करते रहेंगे। हालांकि, मुख्यमंत्री ने बहुत भरोसा दिलाया है पर उनके अफसर-बाबू यहां किसकी सुनते हैं। बातों के बीच सुका कतली से सूत कातने में जुट जाते हैं। इसी सूत से वे लोग जनेऊ बनाते हैं। हर तीन महीने पर वे इसे बदलते हैं। साथ ही घर के दरवाजे पर गड़ा बांस और तिरंगा भी बदलते हैं, जिसकी वे हर सुबह पूजा करते हैं। एतवा टाना भगत की टीस है कि टाना भगतों ने शिद्दत से स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई लड़ी, गांधी के विचारों का अनुसरण किया, लेकिन आजादी के दशकों बाद भी वे लोग पक्की सड़कें, पक्के मकान, सिंचाई के साधन और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए तरसते रहे हैं। अलबत्ता प्रखंड से राज्य मुख्यालय तक अपनी बात पहुंचाने के लिए तिरंगा थामे घड़ी-घंटे के साथ चप्पलें जरूर घिसते रहे।
क्यों हाशिए पर रहे
जतरा टाना की मूर्ति के ठीक सामने मंगरा टाना भगत का जीर्ण-शीर्ण कच्चा मकान है। वह बताने लगे, "पुरखों के आंदोलन, वीरगाथा को ओढ़ना-बिछौना बनाया और पठारी जमीन को जीने का जरिया। झूठ बोला नहीं जाता। अहिंसा से खांटी तौबा। और तंत्र के सामने चिरौरी भी नहीं। जाहिर है हमारा मकान कच्चा रहेगा, चेहरे पर उदासी रहेगी और पैसा-पूंजी भी साथ नहीं होगा।" मंगरा के सवाल भी हैं। अंग्रेजों-जमींदारों से पुरखों की लड़ाई भी बेहद कठिन रही होगी जबकि हमारी लड़ाई तो अपनी सरकार अपना राज में कठिन बन पड़ी है। उन्हें इसका दुख है कि जतरा टाना भगत के मूर्ति स्थल का सौंदर्यीकरण कराने पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। और जो वादे किए जाते हैं वो जमीन पर नहीं उतारे जाते।
सरकारी योजना के तहत इस गांव में चार लोगों को अब तक पक्का मकान मिला है। एतवा टाना के बेटे बिरसा को फौज की नौकरी मिल गई है जबकि गांव के एक युवा मंगे टाना भगत पारा शिक्षक (शिक्षामित्र) का काम मिला है। टाना भगतों में बड़े-बुजुर्गों की लंबी केस-दाढ़ी। सफेद धोती, पगड़ी-टोपी, महिलाओं की सफेद साड़ी यही पहचान रही है। लेकिन युवाओं और बच्चों के बीच अब ये परंपरा हाशिए पर पड़ती दिख रही है। बी.ए. की पढ़ाई कर रहे जीतू टाना भगत कहते हैं कि उन लोगों को रोजगार का सवाल डराता है। डर इसका भी है कि अधिकारों के लिए उनके बाप-दादा का आंदोलन, इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाएगा। यह सिलसिला आखिर कब तक चलेगा कि विकास और अधिकार के सवाल पर टाना भगतों का समूह हर दिन अपनी मांग लेकर अधिकारी-नेता से मिलकर दुखड़ा सुनाते रहें।
पत्थरों में संजोई हैं यादें
इसी गांव के सीमाना पर ग्रामीणों ने टाना भगत स्मारक बनाया है। पत्थरों पर अलग-अलग गावों से टाना भगत स्वतंत्रता सेनानियों के नाम खुदे हैं। यहीं पर मिले महादेव टाना भगत। उन्हें इसका दुख है कि इस स्थल की अब तक प्रशासन ने घेराबंदी नहीं कराई है जबकि यही पत्थर उन्हें लड़ने की ताकत देते हैं। घर-गृहस्थी के सवाल पर वह बताने लगे कि सिंचाई की सुविधा मिल जाए, तो वे लोग अपने दम पर आगे निकल जाएंगे। टाना भगतों के मन-मिजाज इसके संकेत भी देते रहे कि हर किसी को पूरे समुदाय की चिंता है ना कि खुद की।
विकास प्राधिकार
इधर टाना भगतों के समेकित विकास और कल्याण के लिए सरकार ने मुख्य सचिव की अध्यक्षता में प्राधिकार का गठन किया है। इसमें टाना भगतों के पांच प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जा रहा है। हाल ही में इस समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ राज्य के मुख्यमंत्री रघुबर दास ने बैठक की है। साथ ही वादा किया है कि सरकार उन्हें हर हाल में मुख्यधारा में लाएगी। मुख्यमंत्री ने ऐलान किया है कि जिन टाना भगतों के घर नहीं हैं। उन्हें सरकार मकान बनाकर देगी। हर परिवार की महिलाओं को चार-चार गायें भी दी जाएंगी। साथ ही राजधानी रांची में टाना भगतों के लिए अतिथि गृह का निर्माण होगा और उन्हें पेंशन भी दी जाएगी।