राजभवन के सामने प्रदर्शन कर रहे शिक्षेत्तर कर्मचारी
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झारखंड में सरकार की बेरुखी के खिलाफ राजभवन के सामने पिछले 97 दिनों से धरने पर बैठे अंगीभूत महाविद्यालयों के शिक्षेत्तर कर्मचारी अब विरोध के नए-नए तरीके अपनाकर सरकार का ध्यान खींचने की कोशिश कर रहे हैं। बुधवार को भारी बारिश के बीच भी धरना स्थल पर डटे इन कर्मचारियों ने भजन-कीर्तन कर सरकार की संवेदनहीनता पर सवाल उठाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द उनकी मांगों पर विचार नहीं हुआ, तो आत्मदाह ही अंतिम विकल्प होगा।
वेतन बंद, नौकरी खत्म, परिवार पर भुखमरी का संकट
राज्य के विभिन्न महाविद्यालयों में 20 से 25 वर्षों तक सेवा दे चुके लगभग 300 शिक्षेत्तर कर्मचारियों को राज्य सरकार द्वारा अचानक सेवा से बाहर कर दिया गया है। इन कर्मचारियों की मांग है कि उन्हें यूजीसी के तहत संयोजित किया जाए, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित हो सके। एक अप्रैल 2025 से इनका वेतन पूरी तरह से बंद है, जिससे इन परिवारों के सामने भुखमरी, बच्चों की फीस और इलाज जैसी बुनियादी समस्याएं खड़ी हो गई हैं।
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धरना स्थल बना प्रतीकात्मक संघर्ष का केंद्र
पिछले तीन महीनों से ज्यादा समय से कर्मचारी राजभवन के सामने धरने पर डटे हुए हैं, लेकिन अब तक न तो राज्य सरकार और न ही विश्वविद्यालय प्रशासन ने इनसे वार्ता करने की जरूरत समझी है।
धरना स्थल पर हवन, पूजा-पाठ, पकौड़े तलकर आम जनता को बेचना, जूता पॉलिश करना जैसे प्रतीकात्मक आंदोलन कर चुके ये कर्मचारी अब भजन-कीर्तन के माध्यम से विरोध जता रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब सरकार को भगवान ही जगा सकते हैं।
‘अब आत्मदाह ही एकमात्र रास्ता’
शिक्षेत्तर कर्मचारी संघ के अध्यक्ष सौरभ मिश्रा ने कहा कि राज्य सरकार हमारे भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। इतने वर्षों तक सेवा देने के बाद हमें दरकिनार कर दिया गया। हमारे पास कोई विकल्प नहीं बचा है। अब हमारे बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, परिवार के लिए रोटी जुटाना भी मुश्किल हो गया है। उन्होंने साफ तौर पर चेतावनी दी कि यदि सरकार अब भी नहीं जागी, तो आंदोलन को अंतिम स्तर पर ले जाया जाएगा, जहां आत्मदाह ही विकल्प बचेगा।
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