झारखंड में अगले सात तक एयरोसोल (धूल-मिट्टी के अलावा कार्बन के छोटे-छोटे कम) प्रदूषण में पांच फीसदी की वृद्धि होने की संभावना है। इससे इससे दृश्यता (एओडी) के स्तर में गिरावट आ सकती है। परिणामस्वरूप नागरिकों के लिए कई स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं। एक रिसर्च ऑर्गनाइजेशन की स्टडी रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।
'अत्यधिक संवेदनशील' रेड जोन में पहुंच सकता है प्रदूषण
इस तरह के प्रदूषण से राज्य के 'अत्यधिक संवेदनशील' रेड जोन में पहुंचने की संभावना है। स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक, थर्मल पावर प्लांट से उत्सर्जन में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम 2.5 और पीएम 10), समुद्री नमक, सल्फेट, ब्लैक और ऑर्गेनिक कार्बन युक्त उच्च एयरोसोल की मात्रा का मुख्य योगदान था।
2023 तक एयरोसोल प्रदूषण में पांच फीसदी वृद्धि की संभावना
रिपोर्ट में बताया गया है कि एयरोसोल प्रदूषण के बढ़ने से अस्थमा, फेफड़े और हृदय संबंधी बीमारियां बढ़ सकती हैं। कोलकाता स्थित बोस इंस्टीट्यूट के पर्यावरण विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अभिजीत चटर्जी ने बताया कि इससे बच्चे, महिलाएं और बुजर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। चटर्जी ने यह भी बताया कि 2023 तक एयरोसोल प्रदूषण में पांच फीसदी की वृद्धि होने की उम्मीद है।
एयरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ क्या है?
एयरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ (एओडी), वातावरण में मौजूद एरोसोल का एक मात्रात्मक अनुमान है और इसे पीएम 2.5 के प्रॉक्सी माप के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने बताया कि झारखंड अभी रेड जोन में आता है। इसके देखते हुए उपग्रह-आधारित आंकड़ों का अध्ययन करके लंबे समय तक शोध किया गया। यह शोध (भारत में राज्य स्तर पर एयरोसोल प्रदूषण) अभिजित चटर्जी और उनके ही संस्थान की रिसर्च स्कॉलर मोनामी द्वारा किया गया था।
0 अधिकतम दृश्यता के साथ पूरी तरह साप आकाश का संकेतक है, जबकि 1 बहुत धुंधले वातावरण को इंगित करता है। 0.3 से कम एओडी ग्रीन जोन (सुरक्षित), 0.3 से 0.4 ब्लू जोन (कम सुरक्षित), 0.4 से 0.5 ऑरेंज जोन (असुरक्षित) है, जबकि 0.5से ज्यादा रेड जोन (अत्यधिक असुरक्षित) के अंतर्गत आता है। स्टडी में 0.4 तक एओडी परिमाण को एयरोसोल प्रदूषण के लिहाज से सुरक्षित माना गया है। इस सीमा से ऊपर के राज्यों को असुरक्षित माना गया है।