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विश्व रंगमंच दिवस: रंगमंच की दुनिया में डोगरी नाटकों ने छोड़ी अमिट छाप, जानिए रंगकर्मियों की जुबानी डोगरी रंगमंच की कहानी

Sun, 27 Mar 2022 12:28 PM IST
kumar गुलशन कुमार अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू

सार

डोगरी भाषा को विश्व में पहचान दिलाने में रंगमंच का बड़ा योगदान रहा है। जम्मू-कश्मीर में अस्थिरता से कला और साहित्य के प्रति रुझान पर असर पड़ा है। रंगमंच एक ऐसा साधन है जो अलग-अलग समुदायों को भी साथ ले आता है।
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घुमाई नाटक का एक दृश्य। - फोटो : अमर उजाला
विश्व रंगमंच दिवस विश्व स्तर पर सबसे पहले 27 मार्च 1961 में अंतरराष्ट्रीय थियेटर इंस्टीट्यूट द्वारा मनाने की शुरुआत की गई। यह दिन रंगमंच से जुड़े उन कलाकारों को याद करने का दिन है, जिन्होंने प्रदेश, देश और दुनिया में अपने अभिनय का लोहा मनवाया है। सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफार्म के युग में भी रंगमंच अपनी चमक बनाए हुए है। जम्मू-कश्मीर की बात करें तो यहां आतंकवाद और अस्थिर माहौल के बावजूद डोगरी रंगमंच ने तमाम चुनौतियों से जूझते हुए अपने नए आयाम गढ़े हैं। डुग्गर प्रदेश की मिट्टी की खुशबू राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर शिद्दत से महसूस होती है। इसमें डोगरी में मंचित नाटकों का बड़ा योगदान है। 

बाबा जित्तो और घुमाई जैसे डोगरी नाटकों ने तो रंगमंच की दुनिया में अमिट छाप छोड़ी है। डोगरी भाषा की मान्यता के बाद डोगरी रंगमंच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान के साथ आगे बढ़ रहा है। बाबा जित्तो, घुमाई, देवयानी, सुनो एह् कहानी जैसे कुछ नाटक तो डुग्गर की मिट्टी से जुड़े हुए हैं, जिसमें दर्शक खुद को अपने आसपास के परिवेश को महसूस करता है। इसमें नित नए प्रयोग युवा पीढ़ी को भी आकर्षित करते हैं।
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कलाकार घुमाई नाटक का मंचन करते हुए। - फोटो : अमर उजाला
घुमाईं नाटक का कोलकाता में तीन बार मंचन हो चुका है। नंदिकर के राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव में यह पहला नाटक था, जिसे दर्शकों की मांग पर बार-बार मंचित किया गया। गैर बंगाली नाटक की ऐसी प्रतिक्रिया निश्चित तौर पर डुग्गर के रंगमंच के लिए बड़ी उपलब्धि है। यह वही नाटक है, जो फ्रैंकफर्ट इंटरनेशनल थिएटर फेस्टिवल रूस, आठ जी थिएटर ओलंपिक्स और कॉमनवेल्थ गेम्स में प्रस्तुत हो चुका है। नाटक घुमाई भारतीय रंगमंच में सत्तर से भी अधिक बार मंचित हो चुका है। पद्मश्री बलवंत ठाकुर द्वारा लिखित व निर्देशित डोगरी नाटक सुनो एह् कहानी का प्रदर्शन नेशनल ओपन एयर थिएटर फेस्टिवल कोलकाता में हो चुका है।
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अभिनव थियेटर में आयोजित नाटक। - फोटो : अमर उजाला
सुधीर महाजन द्वारा निर्देशित नाटक अद्दा सच राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव चंडीगढ़ में प्रस्तुत हो चुका है। बाबा जीतमल और डाकघर नाटक ने भी देश के विभिन्न प्रेक्षागृहों में खूब तालियां बटोरी हैं। मोहन सिंह द्वारा लिखित व निर्देशित नाटक अपनी डफली अपना राग जो बेंगलुरू में भी प्रस्तुत हो चुका है, दर्शकों को शुरू से आखिर तक बांधे रखता है। कुल मिलाकर डोगरी रंगमंच अपनी माटी की महक लिए भारतीय और विश्वमंच रंगमंच पर कड़ी प्रतिस्पर्द्धा के साथ खड़ा है। लकड़ी के बनाए मंच और सीमित संसाधनों के बीच शुरू हुआ नाटक खेलने का सफर आज न सिर्फ भव्य प्रस्तुतियों के साथ हमारे सामने है, बल्कि इसके साथ डुग्गर की संस्कृति और उसकी पहचान भी आगे बढ़ी है।

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मॉरीशस में भारत के सांस्कृतिक राजनयिक एवं वरिष्ठ रंगकर्मी पद्मश्री बलवंत ठाकुर। - फोटो : अमर उजाला
अपनी जड़ों से जुड़ना होगा 
मॉरीशस में भारत के सांस्कृतिक राजनयिक एवं वरिष्ठ रंगकर्मी पद्मश्री बलवंत ठाकुर कहते हैं कि कला समाज को आगे बढ़ाती है। हमें साहित्य और कला से जुड़ना होगा। स्थानीय कलाकारों, कवियों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों के हुनर को पहचानना होगा। हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए पहले से बनी सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देनी चाहिए।
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अभिनव थियेटर में आयोजित नाटक। - फोटो : अमर उजाला
रंगमंच ने डोगरी भाषा को दुनिया में अलग पहचान दिलाई
बलवंत ठाकुर ने कहा कि डोगरी भाषा को विश्व में पहचान दिलाने में रंगमंच का बड़ा योगदान रहा है। जम्मू-कश्मीर में अस्थिरता से कला और साहित्य के प्रति रुझान पर असर पड़ा है। रंगमंच एक ऐसा साधन है जो अलग-अलग समुदायों को भी साथ ले आता है। युवा इस तरफ बढ़ना चाहते हैं तो उन्हें मौके खोजने होंगे। वर्तमान समय में चुनौतियां ज्यादा हैं, लेकिन प्रयासों की निरंतरता से लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
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अभिनव थियेटर में आयोजित नाटक का दृश्य। - फोटो : अमर उजाला
लोगों के बीच जाएंगे, तभी दर्शकों से जुड़ पाएंगे
एक साथ रंगमंडल के संस्थापक विजय मल्ला कहते हैं कि कलाकारों में अभिनय के प्रति पहले जैसा समर्पण नहीं दिखता। कलाकार लोगाें के बीच नहीं जाते, जिससे उनका दर्शकों से तारतम्य नहीं बैठ पाता। उन्होंने कहा कि डोगरी रंगमंच को आगे बढ़ाने के लिए इस भाषा को बच्चों तक ले जाना होगा। बच्चों को डोगरी भाषा बोलना, पढ़ना और लिखना सिखाई जानी चाहिए। हम दूसरे प्रदेश और विदेश के नाटकों को तो डोगरी भाषा में खेलना चाहते हैं, लेकिन इसके अनुवाद में दिक्कत के चलते लोग इससे पूरी तरह से जुड़ नहीं पाते हैं। कला के लिए भाव चेहरे से नहीं बल्कि दिल और भाषा से आते हैं।
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नटमंच के संस्थापक तरुण शर्मा। - फोटो : अमर उजाला
स्थानीय कलाकारों को कम मिलता है सम्मानए सुविधाओं की कमी
नटमंच के संस्थापक तरुण शर्मा कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर के कलाकारों के लिए मंच और सम्मान का अभाव है। दूसरे राज्यों के कलाकारों की प्रस्तुतियों का व्यापक प्रचार होता है, जिससे दर्शक उमड़ते हैं। प्रदेश में कई टीवी शो शूट होते हैं, जिनमें स्थानीय कलाकारों को अवसर मिलने चाहिए। इसे बढ़ाने के लिए जम्मू डुग्गर फेस्टिवल या किसी और नाम से बड़े स्तर के कार्यक्रम होने चाहिए। डोगरी नाटक, गीतड़ू, भाख और डोगरी साहित्य के साथ जम्मू के व्यंजन मिलकर डोगरी रंगमंच को बढ़ावा दे सकते हैं।

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नाटक के मंचन का दृश्य। - फोटो : अमर उजाला
भाव चेहरे से नहीं दिल और भाषा से आते हैं
विजय मल्ला ने कहा कि युवा कलाकार जो रंगमंच की दुनिया में शामिल होना चाहते हैं, उन्हें भाषा की बेहतर समझ होना जरूरी है। कला के लिए जो भाव चाहिए वे चेहरे से नहीं दिल और भाषा से आते हैं। वे अपनी शुरुआत अखबार और किताबें पढ़ने से कर सकते हैं, ताकि भाषा पर उनकी पकड़ बनें। वे अपनी टीम बना कर नुक्कड़ नाटक कर सकते हैं।
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टैगोर थिएटर में लोक गाथा। - फोटो : amar ujala
युवाओं को संदेश, कोई भी मौका न छोड़ें और अगर मौका नहीं है तो उसे खोजें
बलवंत ठाकुर ने कहा कि विश्व रंगमंच दिवस एक अवसर है, जब हम एक नई सोच के साथ, एक नए जोश के साथ शुरुआत करें। कला की तरफ झुकाव करें और एक बेहतर समाज बनाएं। नए युवा जो इस क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं वो कोई भी मौका न छोड़ें और अगर मौका नहीं है तो उसे खोजें। यह सच है कि आज के समय में चुनौतियां ज्यादा हैं। अपने आप को इन चुनौतियों से जूझने के लिए तैयार करें। निरंतर प्रयास करते रहें। 
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