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जम्मू कश्मीर की ये बेटियां बनी हजारों लड़कियों की प्रेरणा

Tue, 08 Mar 2016 12:30 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/जम्मू

सार

  • रामबन जिले के मैतरा गांव के लोगों को शायद ही इस बात का इल्म होगा कि जिस लड़की के पढ़ने का वह विरोध करते थे, वह रियासत की ‘झांसी की रानी’ बन जाएगी। 
  •  जम्मू कश्मीर पुलिस की इंस्पेक्टर शक्ति शर्मा युवा वर्ग की लड़कियों के लिए आदर्श हैं। दो बार यूएन मिशन का हिस्सा रह चुकीं शक्ति शर्मा ने अपनी काबलियत से अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर गहरी छाप छोड़ी है। 
  • दीपा शर्मा जम्मू हाईकोर्ट में वकील हैं। वह लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही आत्मरक्षा के लिए तैयार होने की भी वकालत भी करती हैं। 
  •  पेशे से वकील और बैंकर, लेकिन शौक ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी बना दिया। लगन, दृढ़ निश्चय और मेहनत के बूते जम्मू की तीन बेटियों ने खुद को कराटे में ब्लैक बेल्ट के स्तर तक पहुंचाया। 
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- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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..और बन गई ‘झांसी की रानी’
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1999 में एक दिन वह अपने कुछ साथियों के साथ बैठी हुई थीं। तभी एक साथी पुलिस अधिकारी अपने सूत्र के साथ आए और बोले कि एक व्यक्ति के घर आतंकी आते हैं। उसको पकड़ने जाना है। वह उनके साथ चल पड़ीं। जैसे ही उस व्यक्ति के घर पहुंचे तो अंदर से गोलियां चलने लगीं।

तभी उक्त अधिकारी वहां से भाग निकले। वह अकेली रह गईं। उन्होंने अपने तीन साथियों के साथ मिलकर आतंकियों का सामना किया। हालांकि बाद में अन्य सुरक्षा एजेंसियां भी आ गईं, लेकिन तीन घंटे तक वह डटी रहीं। तब से ही साथी उन्हें ‘झांसी की रानी’ कहने लगे। इसके बाद उन्हें आउट आफ टर्न प्रमोशन मिला। वह सब इंस्पेक्टर से सीधे इंचार्ज डीएसपी बन गईं।
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एसओजी की पहली महिला अधिकारी
 
रामबन जिले के मैतरा गांव के लोगों को शायद ही इस बात का इल्म होगा कि जिस लड़की के पढ़ने का वह विरोध करते थे, वह रियासत की ‘झांसी की रानी’ बन जाएगी। ये हैं आईआरपी 15 बटालियन की महिला अधिकारी रानु कुंडल। उनका जज्बा ही था कि वह आतंकियों के खिलाफ गठित स्पेशल आपरेशन ग्रुप में पहली महिला अधिकारी बनीं। इसके लिए उन्हें डीजीपी और मेरीटोरियस सर्विस का मेडल भी दिया गया।

डीएसपी रानु कुंडल 1990 में पुलिस में बतौर सब इंस्पेक्टर भर्ती हुईं। एम फिल करने के बाद वह पुलिस में चयनित हुईं। कुंडल का कहना है कि तब लड़कियों की पढ़ाई का विरोध किया जाता था। पिता की मौत के बाद मां के कंधों पर सारा बोझ था।

सबसे बड़ी चुनौती थी उनके पढ़ाई की, लेकिन मां ने हिम्मत नहीं हारी और पढ़ाया। आसपास के लोग कहते थे कि पढ़ाई से कुछ नहीं होगा। इन सबके बावजूद मेरा सपना था कि कुछ करके दिखाऊं। इसलिए पुलिस में भर्ती हुईं। नब्बे के दशक में जब आतंक चरम पर था। तब वे एसओजी में शामिल हुईं। 1997 से लेकर 2001 तक उन्होंने श्रीनगर में 100 से अधिक आपरेशन में हिस्सा लिया।

दो बार बनीं यूएन शांति मिशन का हिस्सा

जम्मू कश्मीर पुलिस की इंस्पेक्टर शक्ति शर्मा दो बार यूएन मिशन का हिस्सा रह चुकीं हैं। - फोटो : Amar Ujala
जम्मू कश्मीर पुलिस की इंस्पेक्टर शक्ति शर्मा युवा वर्ग की लड़कियों के लिए आदर्श हैं। दो बार यूएन मिशन का हिस्सा रह चुकीं शक्ति शर्मा ने अपनी काबलियत से अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर गहरी छाप छोड़ी है। शायद यही कारण है कि उन्हें इस वर्ष गणतंत्र दिवस के मौके पर राजपथ में 100 विमेन अचीवर में शामिल किया गया। उधमपुर जिले के छोटे से गांव बरनाडा में जन्मी शक्ति शर्मा इलाके की बेटियों के लिए मिसाल हैं।

वर्ष 2000 में बतौर सब इंस्पेक्टर भर्ती हुई शक्ति शर्मा ने जब 2013 मई में अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन को चुना तो उनके परिजनों ने नाराजगी जताई और कहा कि वह उसे नहीं जाने देंगे। इसके बावजूद वह अफगानिस्तान गई। वहां महिलाओं को आत्मरक्षा और शांति स्थापित करने के गुर सिखा चुकी हैं। 

विश्व में शांति का संदेश देने और आतंकवाद प्रभावित देशों में महिलाओं को शोषण से मुक्ति दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाली शक्ति शर्मा को 2014 में अंतरराष्ट्रीय महिला पुलिस शांति दूत पुरस्कार दिया गया, तब उनके परिजनों को बेटी की कामयाबी का एहसास हुआ। 

शक्ति शर्मा ने 2012 में दक्षिण पूर्व एशिया में स्थित ईस्ट तिमोर में एक वर्ष तक संयुक्त राष्ट्र का हिस्सा बनकर महिलाओं को शोषण से बचने की ट्रेनिंग भी दी। महिला थाना, बागे बाहु थाना आदि में अपनी सेवाएं दे चुकीं शक्ति शर्मा इस समय सिटी पुलिस स्टेशन की इंस्पेक्टर हैं।

शौक ने बना दिया कराटे की राष्ट्रीय खिलाड़ी

कराटे प्लेयर दीपा , दीपका और श्वेता - फोटो : Amar Ujala
पेशे से वकील और बैंकर, लेकिन शौक ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी बना दिया। लगन, दृढ़ निश्चय और मेहनत के बूते जम्मू की तीन बेटियों ने खुद को कराटे में ब्लैक बेल्ट के स्तर तक पहुंचाया। पेशे से तो तीनों बेटियां अपने-अपने काम करती हैं, लेकिन कराटे में इनके बुलंद हौसले सामने वाले को परास्त करने के लिए काफी हैं। 

पंच और विभिन्न चोक की रफ्तार ऐसी कि कोई भी दांतों तले अंगुली दबा ले। दीपा शर्मा, दीपिका चौहान और श्वेता गुप्ता तीनों केरल में हुई सीनियर वर्ग की प्रतियोगिता में हिस्सा ले चुकी हैं। 

तीनों कराटे के माध्यम से एक साथ जुड़ी हुई हैं। कराटे एसोसिएशन आफ इंडिया की मान्यता प्राप्त प्रशिक्षक भी हैं। तीनों का मानना है कि शौक के साथ लगन के कारण ही वह राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी बन पाई हैं।

मार्शल आर्ट्स पाठ्यक्रम में शामिल हो : दीपिका
पेशे से बैंकर दीपिका ने कहा कि कराटे को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। आठवीं तक के हर बच्ची को इसकी शिक्षा दी जानी चाहिए तभी वे आत्मनिर्भर और आत्मरक्षा के काबिल बन सकती हैं। आज के दौर में महिलाओं को आत्मरक्षा के तरीके अपनाना जरूरी हो गया है। 

अगर महिलाएं आत्मरक्षा नहीं कर सकती तो उन पर संकट हमेशा रहेगा। कराटे आत्मरक्षा का ही एक हिस्सा है। चीन, जापान और सिंगापुर जैसे देशों में तो यह सामान्य बात है। दीपिका वर्ष 2014 में स्वर्ण पदक जीतकर राष्ट्रीय चैंपियन बनी थीं। वर्ष 2014 से पहले लगातार तीन बार वह राज्य चैंपियन रही हैं। वह कराटे की ब्लैक बेल्ट खिलाड़ी हैं।


मानसिक और शारीरिक विकास के लिए कराटे जरूरी : श्वेता
पेशे से बैंकर श्वेता गुप्ता ने कहा कि कराटे केवल आत्मरक्षा ही नहीं, मानसिक और शारीरिक विकास के लिए भी जरूरी है। चूंकि यह मार्शल आर्ट्स का ही हिस्सा है ऐसे में अनुशासन और शक्ति का पूरा समन्वय ही किसी को एक बेहतर खिलाड़ी बना सकता है। 
जब कोई अनुशासित होकर अपनी शक्ति को किसी स्थान पर लगाएगा तो उसे सफलता मिलना निश्चित है। श्वेता कराटे में ब्लैक बेल्टधारी हैं। बारह वर्षों से कराटे की सक्रिय खिलाड़ी हैं। राष्ट्रीय स्तर पर कांस्य पदक विजेता भी रह चुकी हैं।
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शशि शर्मा के आगे पहाड़ पड़ जाते बौने

एनसीसी कैडेट शश‌ि शर्मा - फोटो : Amar Ujala
परेड महिला कालेज में आर्ट्स की छात्रा शशि शर्मा को वर्ष 2015 में माउंट एवरेस्ट के पर्वतारोही समूह के लिए शार्टलिस्ट किया गया। वह हिमस्खलन से बचने और आईस क्लाइंबिंग सहित कई दुश्वार चुनौतियों से निपटने में महारत हासिल कर चुकी हैं। जोखिम उठाकर खुद को साबित करने की आदत छोड़ी नहीं। शशि ने पैरा ट्रूपर्स ट्रेनिंग स्कूल आगरा में प्रशिक्षण लिया। 

तमाम तरह की परीक्षाएं पास करने के बाद आखिरकार हजारों फुट की ऊंचाई से पैरा जंप लगाने का सपना भी पूरा कर लिया। सुंदरबनी की रहने वाली शशि कहती है गांव में लड़कियों को लड़कों के मुकाबले कमतर आंका जाता है। उसे इस सोच को बदलना है। 

पैरा जंपिंग के दौरान उसने दो लड़कियों को गंभीर रूप से घायल होते देखा। एक प्रशिक्षु की मौत भी देखी, लेकिन वह जरा भी विचलित नहीं हुई। उसने पहला जंप 1500 फुट की ऊंचाई से किया जिसके बाद अगले दो जंप इससे दस गुना अधिक ऊंचाई से करना आसान हो गया। शशि शर्मा सैन्य अफसर बनना चाहती है।

सेरिंग अंगमो सर्वश्रेष्ठ कैडेट
कालेज से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेरिंग अंगमो का नेतृत्व कौशल सराहनीय रहा है। लद्दाख रीजन के दुरबुक गांव की रहने वाली सेरिंग कालेज में सर्वश्रेष्ठ कैडेट रही। आरडीसी 2014 में बेस्ट गार्ड कमांडर गार्ड आफ ऑनर के प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चुनी गई। 

यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत रशिया गए 25 सदस्यीय भारतीय दल का हिस्सा रही। अंगमो जम्मू यूनिवर्सिटी में सोशियोलाजी में पीजी कर रही है। अंगमो कहती है लेह में रहते हुए भी उसे सेना आकर्षित करती थी, लेकिन वह सिपाही बनने का ख्वाब बुनती थी। 

एनसीसी में आने के बाद उसका मकसद अब सैन्य अफसर बनना हो गया है। अंगमो तीरंदाजी में तीन दफा राष्ट्रीय स्पर्धा में हिस्सा ले चुकी है। अब सेना में जाकर खेल को आगे बढ़ाना चाहती है।
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