जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव का खंडित जनादेश न केवल राज्य की भौगोलिक और सामाजिक विविधता को दिखाता है बल्कि मुद्दों और प्रत्यक्षीकरण में अंतर को भी दिखाता है। इस चुनाव में किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला है।
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पीडीपी 28 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। लेकिन उसकी उपस्थिति केवल कश्मीर घाटी में ही है। वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जम्मू इलाके में 25 सीटें जीती हैं। लेकिन उसे कश्मीर घाटी में कोई सीट नहीं मिली है।
नेशनल कांफ्रेंस 15 सीटें जीतकर तीसरे स्थान पर है। उसे भी अधिकांश सीटें कश्मीर घाटी में ही मिली हैं। वहीं 12 सीटें जीतकर कांग्रेस चौथे स्थान पर है। कांग्रेस ने जम्मू और श्रीनगर के साथ-साथ लद्दाख में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। लद्दाख में विधानसभा की चार सीटें हैं। चारों दलों को मिले वोट से ही खंडित जनादेश स्पष्ट हो जाता है।
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कैसा रहा पार्टियों का प्रदर्शन?
वोट शेयर के मामले में 23 फीसदी वोट लेकर भाजपा पहले नंबर पर है। पीडीपी 22.7 फीसदी वोटों के साथ दूसरे नंबर पर है। नेशनल कांफ्रेंस को 20.08 फीसदी और कांग्रेस को 18 फीसदी वोट मिले हैं।
यह सही है कि पीडीपी ने 2008 के विधानसभा चुनाव की तुलना में अपना प्रदर्शन सुधारा है। विधानसभा के पिछले चुनाव में उसे 15.3 फीसदी वोट और 21 सीटें मिली थीं। घाटी में कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के बीच वोटों के बंट जाने से उसे फायदा हुआ था।
भाजपा 25 सीटें जीतने में कामयाब तो हुई है लेकिन यह उसके मिशन-44 के आंकड़ों से काफी कम है। लोकसभा चुनाव के मुकाबले भाजपा अपने प्रदशर्न में मामूली सुधार ही कर पाई। लोकसभा चुनाव में उसने 24 विधानसभा सीटों पर बढ़त बनाई थी और 33 फीसद वोट हासिल किए थे।
इस तरह लोकसभा चुनव की तुलना में उसे नौ फीसदी वोट कम मिले हैं। कांग्रेस को पिछली बार की 17 सीटों की तुलना में इस बार सीटें तो कम मिली हैं। लेकिन कमोबेश उसका पुराना वोट फीसद बना हुआ है।
किस पार्टी को कितने फीसदी वोट मिले?
इस बार के चुनाव में सबसे अधिक घाटा नेशनल कांफ्रेंस को हुआ है। पिछली बार उसे 28 सीटें मिलीं थीं। इस बार उसका वोट फीसदी भी करीब पांच फीसदी घटा है। नेशनल कांफ्रेंस को सबसे ज्यादा घाटा जम्मू इलाके में हुआ है, जहां भाजपा फायदे में रही है।
इस खंडित जनादेश में एक बात साफ नजर आती है। वह यह कि यह जम्मू कश्मीर में बदलाब के लिए वोट था। मतदाताओं ने अपने-अपने इलाकों में अपनी पसंद की पार्टी को वोट दिया।
यह साफ है कि वो विकास के लिए बदलाव चाहते हैं। मतदाताओं में बदलाव की यह चाहत पिछले छह साल में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस सरकार के काम से पैदा हुए असंतोष की वजह से पैदा हुई।
बदलाव की यह चाहत जम्मू और घाटी दोनों के वोटरों में थी। लेकिन घाटी के मतदाताओं में यह भावना अधिक थी। बिजली की आपूर्ति, सड़कों की दशा या राज्य में विकास की हालत से लोग खुश नहीं थे। वो यह मानने को तैयार नहीं थे कि पिछले छह साल में चीजें बदली हैं।
क्यों लोगों ने किए सत्ता के खिलाफ वोट
अगर यह मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को नाराज करने और उसे सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ करने के लिए काफी नहीं है तो भी मतदाताओं के एक बड़े धड़े का यह मानना था कि राज्य सरकार भ्रष्ट है, इसने मतदाताओं को नेशनल कांफ्रेंस के खिलाफ कर दिया।
पिछले कुछ सालों में राज्य में बहुत कम नौकरियों के अवसर बनाए गए हैं। इसने भी मामले को और गंभीर बना दिया। लोग केवल सरकार के काम से ही दुखी नहीं थे बल्कि मतदाताओं में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के प्रति भी गुस्सा था।
उनकी लोकप्रियता का ग्राफ पीडीपी की नेता मुफ़्ती मोहम्मद सईद की तुलना में काफी नीचे था। यह इस बात से भी पता चलता है कि उमर को सोनावर में हार का सामना करना पड़ा और बीरवाह में उनकी जीत का अंतर बहुत कम था।
भाजपा का जम्मू में अच्छा प्रदर्शन
जम्मू इलाके में केंद्र सरकार और उससे अधिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लोगों की संतुष्टि ने भाजपा को इस इलाके में सभी वर्गों का वोट हासिल करने में फायदा पहुंचाया।
हालांकि पार्टी कश्मीर घाटी के लोगों को यकीन दिला पाने में नाकाम रही। वहां से उसे मुश्किल से एक फीसद वोट ही मिला। जम्मू हिंदू बहुल्य इलाका है, लगता है यहां भाजपा को राज्य में हिंदू मुख्यमंत्री बनाने के विचार का भी फायदा मिला।
जम्मू में कांग्रेस को भी कुछ फायदा मिला, खासकर गुलाम नबी आजाद की व्यक्तिगत लोकप्रियता की वजह से। घाटी में पीडीपी के अच्छे प्रदर्शन की वजह पीडीपी-कांग्रेस की सरकार में हुए कुछ अच्छे फैसले भी हो सकते हैं, जो कि मतदाताओं की स्मृति में अभी भी बने हुए हैं।
घाटी में लोगों ने पीडीपी को राज्य की विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए उपयुक्त पार्टी के रूप में देखा। जम्मू में लोगों ने भाजपा को इस मामले में ज्यादा सक्षम माना।
चुनाव पूरे हो चुके हैं। परिणाम आ गए हैं। लोगों ने खंडित जनादेश दिया है। राजनीतिक नजरिए में स्पष्ट अंतर ही दोनों इलाकों के चुनाव परिणाम में अंतर का प्रमाण है। पीडीपी 28 सीटें जीतकर जम्मू कश्मीर की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है।
लेकिन लगता है कि विकास और बदलाव के लिए वोट दोनों इलाकों के मतदताओं को एक करता है। यह संदेश बहुत साफ है। मुझे लगता है कि राजनीतिक दल सरकार के ज़रिए समस्याओं के समाधान के लिए काम करेंगे और उन मतदाताओं की इच्छा को पूरा करेंगे, जो ठंड की परवाह न करते हुए बड़ी संख्या में मतदान के लिए निकले।
इसकी वजह से राज्य में 2008 में हुए 61.2 फीसदी मतदान की तुलना में 2014 में 66.40 फीसदी मतदान हुआ। यह लोगों में बदलाव की चाहत का प्रतीक है।