उत्तरकाशी, हिमाचल प्रदेश और अब जम्मू-कश्मीर...विशेषज्ञों के मुताबिक, पहाड़ी इलाकों में बादल फटने की घटनाओं में एक दशक के भीतर तेजी से बढ़ोतरी हुई है। एक अनुमान के मुताबिक, अब उत्तराखंड और हिमाचल के पहाड़ों में डेढ़ गुना से ज्यादा बादल फटने की घटनाएं हो रही हैं। ज्यादातर घटनाएं मानसून की बारिश के दौरान ही होती हैं। जानते हैं, बादल कैसे, कब और क्यों फटते हैं...
बादल का फटना
बादल का फटना या क्लाउडबर्स्ट यानी बहुत कम समय में सीमित दायरे में अचानक बहुत भारी बारिश होना है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक अगर किसी क्षेत्र में 20-30 वर्ग किमी दायरे में एक घंटे में 100 मिलीमीटर बारिश होती है, तो उसे बादल का फटना कहा जाता है। इससे अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाएं होती हैं। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ डिजास्टर रिस्क रिडक्शन में प्रकाशित शोध बताता है कि ऊपरी गंगा बेसिन में अत्यधिक वर्षा के कारण अचानक बाढ़, भूस्खलन और जन-धन की हानि सामान्य होती जा रही है। हिमालयी क्षेत्र में मानसून के महीनों जुलाई-अगस्त के दौरान ऐसी घटनाएं सर्वाधिक होती हैं। आंकड़ों के अनुसार 66.6 प्रतिशत बादल फटने की घटनाएं समुद्र तल से 1000-2000 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में होती हैं, जो आबादी के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील हैं।
तापमान में वृद्धि से बढ़ रहीं बादल फटने की घटनाएं
पोलर साइंस पत्रिका में प्रकाशित नवीनतम शोध के अनुसार, वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण हिमालयी क्षेत्र में नमी और संवहन यानी कन्वेक्शन (ऊष्मा से ऊपरी वायुमंडल में उठने वाली हवा) की प्रक्रिया तेज हो गई है। गर्म हवाएं जब समुद्र से भारी मात्रा में नमी लेकर हिमालय की तलहटी तक पहुंचती हैं, तो पहाड़ इन हवाओं को ऊपर की ओर ले जाते हैं। इस प्रक्रिया को ओरोग्राफिक लिफ्ट कहा जाता है। इससे विशाल क्यूम्यलोनिम्बस नामक बादल बनते हैं, जो बारिश की बड़ी बूंदों को धारण कर सकते हैं। इससे नमी से भरी हुई हवा का प्रवाह ऊपर उठता है और बादल बड़ा होता जाता है। बारिश की कोई संभावना न होने के कारण, यह इतना भारी हो जाता है कि एक बिंदु पर यह फटने लगता है। ऊपर उठते समय जब यह नमी ठंडी हवाओं से मिलती है, तो तीव्र संघनन (कंडंजेशन) होता है और भारी वर्षा के रूप में गिरता है।
जलवायु परिवर्तन की भूमिका
हिमालय में तापमान वृद्धि की दर वैश्विक औसत से अधिक है। इससे वाष्पीकरण बढ़ता है, वातावरण में नमी अधिक होती है व इससे भारी वर्षा की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से भी वायुमंडलीय नमी में वृद्धि होती है, जो स्थानीय स्तर पर अचानक बाढ़ की घटनाओं में योगदान देती है। पोलर साइंस के अध्ययन में यह चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को अस्थिर कर रहा है, जिससे अल्ट्रा लोकलाइज्ड (अत्यधिक सीमित दायरे में होने वाली) वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिन पर पूर्व चेतावनी देना अत्यंत कठिन है।
क्या किया जा सकता है
विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ी राज्यों में उच्च गुणवत्ता वाली मौसम निगरानी प्रणालियों का नेटवर्क खड़ा करना आवश्यक है। संवेदनशील इलाकों में रियल-टाइम रडार सिस्टम और पूर्व चेतावनी तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए। मानसून के दौरान निकासी प्रोटोकॉल पहले से लागू किए जाने चाहिए। ढलान व तलहटी वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को उच्च जोखिम की स्थिति में सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट करने के लिए प्रशासनिक योजनाएं पूर्व निर्धारित होनी चाहिए। स्थानीय समुदायों को जागरूक करने, निर्माण कार्यों पर नियंत्रण लगाने और पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाए रखने के लिए दीर्घकालिक रणनीतियां बनाई जानी चाहिए। विशेषज्ञों का यह भी सुझाव है कि क्लाउड बर्स्ट जोन (सीबीजेड) की स्पष्ट पहचान कर वहां विशेष सुरक्षा उपायों को लागू किया जाना चाहिए।