बारामुला। कश्मीर यूनिवर्सिटी परिसर में रविवार को आयोजित समारोह में उपराज्यपाल नियुक्तिपत्र देने मंच पर आए तो वहां मौजूद आतंकवाद पीड़ित परिजन ने अपना 30 साल का दर्द उनके सामने उड़ेल कर रख दिया। अपनी व्यथा माइक पर बताई कि कैसे महज खाना न देने या आश्रय नहीं देने पर पूरे परिवार को आतंकियों ने खत्म कर दिया। कुछ महिलाएं तो इतनी भावुक हो गईं कि उन्होंने उपराज्यपाल के हाथ चूमकर उन्हें धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि आपसे पहले किसी को हमारी याद नहीं आई।
बारामुला के डेलिना स्थित कश्मीर यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैंपस में सुबह 11 बजे कार्यक्रम शुरू हुआ। मुख्य अतिथि उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने दीप जलाकर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया। इसके बाद शुरू हुआ तीन दशक से पीड़ितों के सीने में दबे दर्द के बाहर आने का दौर। बारामुला के समीर अहमद ने बताया कि कैसे 27 साल पहले दरगाह से निकलते समय उनके पिता की आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। उनके दो चाचाओं को भी आतंकियों ने मार दिया था।
वहीं राजा बेगम अपनी दास्तां बताते हुए फफक पड़ीं। उन्होंने बताया कि आतंकी उनके घर में घुसे और खाना मांगा। खाना नहीं देने पर उनके सामने उनके पति, दो बेटों और एक बेटी को गाेली मार दी। उन्होंने मुश्किल वक्त में अपने बड़े बेटे के बच्चों को संभाला, लेकिन 26 साल में कोई सुध लेने नहीं आया।
उन्होंने कहा कि अब उपराज्यपाल साहब ने जाकर हाल लिया और मदद की बात कही। यहां वही हैं जिन्होंने हमारा दर्द समझा, वरना कितनी सरकारें बदल गईं, हम बेहाल ही थे। वहीं एक अन्य युवक ने बताया कि वह बहुत छोटे थे जब आतंकियों ने उनके पिता की हत्या कर दी। एक साल बाद उनके अंकल को भी मार दिया। मां ने भीख मांगकर हमें पाला, पढ़ाया। अब मैं महज छह हजार रुपये की नौकरी करता हूं। बेहद मुश्किल 27 साल गुजारने के बाद अब सरकारी नौकरी की आस नजर आई है। इसके लिए हम सभी एलजी साहब के शुक्रगुजार हैं।
सिर्फ यही नहीं और भी दर्दनाक व्यथाएं इस दौरान सबके सामने आईं। इसके बाद उपराज्यपाल ने एक-एक कर मंच पर बुलाकर आतंक पीड़ित परिजन को नियुक्तिपत्र सौंपे। इस दौरान किसी ने पैर छूकर आशीर्वाद लिया तो किसी ने हाथ मिलाकर उपराज्यपाल का धन्यवाद दिया। कोई भावुक होकर गले लग गया तो कुछ ने कश्मीरी रवायत के अनुसार हाथ चूमकर धन्यवाद दिया।
इसके बाद उपराज्यपाल ने समारोह को संबोधित किया और बताया कि कैसे 29 जून वो ऐतिहासिक तारीख बन गई जब उन्होंने आतंकवाद के वास्तविक पीड़ितों की व्यथा सुनी। उन्होंने बताया कि किस तरह महज 15 दिन में उन्होंने सभी प्रबंध कर पीड़ित परिजन को नौकरी देना शुरू किया।
पीड़ितों से मिले उपराज्यपाल, सहायता का दिया आश्वासन
कार्यक्रम के बाद मंच से उतरे उपराज्यपाल जब बाहर निकलने को हुए तो कुछ अन्य पीड़ितों ने उनसे अपना दर्द साझा करने की कोशिश की। इस पर उन्होंने पास के ही एण्बंद कमरे में पीड़ितों से बात की। अपना दर्द साझा करते हुए कई पीड़ित तो रो दिए। उपराज्यपाल ने उन्हें हर संभव मदद का भराेसा दिलाया और कहा कि सभी जिलों में हेल्पलाइन गठित की गई हैं। पंजीकरण के बाद प्रक्रिया पूरी करें, प्रशासन उनकी हर तरह से मदद करेगा। कोई परेशानी होने पर मुझसे शिकायत कर सकते हैं।
9 जून, 1992 को मेरे पिता बशीर लोन की बारामूला के फतेहगढ़ गांव में पास की एक मस्जिद से घर लौटते समय आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। एक साल बाद, आतंकवादियों ने उनके दो चाचा गुलाम मोहिउद्दीन लोन और अब्दुल राशिद लोन का अपहरण कर लिया, उनके शव कभी नहीं मिले।
- समीर अहमद
वर्ष 1999 में आतंकवादियों ने मेरे पति गुलाम हसन लोन, दो बेटों जाविद अहमद और इरशाद अहमद, और बेटी दिलशादा की बेरहमी से हत्या कर दी। हमने उन्हें शरण और खाना देने से इनकार कर दिया था। बड़ी मुश्किल से अपने बेटे के बच्चों को संभाला, 26 साल में कोई सुध लेने नहीं आया।
- राजा बेगम, कुपवाड़ा