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काबुल से लौटी शक्ति ने किया बड़ा खुलासा

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‘कब कहां से राकेट लांचर आ जाए और कब कहां विस्फोट हो जाए। यह अफगानिस्तान में आम बात है। ऐसे में वहां शांति मिशन के लिए काम करना, जान जोखिम में डालने से कम नहीं।’ उक्त बातें अफगानिस्तान से लौटी देश की पहली यूएन पीस मेकर अवार्ड विजेता शक्ति शर्मा ने ‘अमर उजाला’ से बातचीत के दौरान कहीं।
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एक दिन पहले वतन में  लौटी जम्मू-कश्मीर पुलिस की महिला इंस्पेक्टर शक्ति का कहना है कि अफगानिस्तान में रोजाना औसतन 80-90 आतंकी वारदातें होती हैं। बम धमाकों की आवाज में जीने की आदत सी पड़ गई है। कई बार आठ-आठ घंटे यूएन कंपाउंड स्थित बंकरों में गुजारनी पड़ती थी।

हालांकि इन सबके बावजूद इंस्पेक्टर शक्ति शर्मा यूएन के अगले मिशन पर जाने के लिए तत्पर है। इंस्पेक्टर मुख्य रूप से अफगानिस्तान के हैरात, फराह, घोर प्रांतों में कार्यरत रही। उन्होंने कहा कि कई बार हमला होने पर वे इलाका छोड़ देते थे।
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इंस्पेक्टर शक्ति कहती हैं, ‘उनका मिशन मई 2015 में समाप्त हो जाएगा। पहले सोचा था कि इसी साल दिसंबर में वापस लौट आऊंगी। लेकिन यूएन अवार्ड मिलने के बाद जिम्मेदारी का अहसास हुआ है। एक माह बाद वापस अफगानिस्तान लौटूंगी। उसके बाद यदि यूएन का अगला मिशन मिलता है और जम्मू-कश्मीर पुलिस आर्गनाइजेशन अनुमति देता है तो तीसरे मिशन का हिस्सा जरूर बनना चाहूंगी।’

अफगानिस्तान में महिला पुलिसकर्मी हमेशा तालिबान के निशाने पर

अफगानिस्तान में भले ही हालात सुधरने के बाद पुलिस में महिलाओं की भर्ती होने लगी है, लेकिन अफगानिस्तान में महिला पुलिसकर्मी हमेशा तालिबान के निशाने पर रहती हैं। इतना ही नहीं, महिला पुलिसकर्मियों को कई बार अपने ही अफसरों से भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उक्त बातें अफगानिस्तान में महिला पुलिस के निर्माण और सिविल सोसाइटी में पुलिस व अवाम के बीच संबंध बनाने के मिशन में लगी इंस्पेक्टर शक्ति शर्मा ने कहीं।

शक्ति शर्मा कहती हैं कि अफगानिस्तान में महिला पुलिस को अभी भी पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया जा रहा। कट्टर मुस्लिम देश होने के कारण वहां पुरुषों की महिलाओं के प्रति सोच अलग है। लोगों के अनपढ़ होने के कारण महिला पुलिस के समक्ष समस्याएं ज्यादा हैं।

हालांकि अब पुलिस अफसर महिला पुलिसकर्मियों की उपयोगिता समझने लगे हैं। लेकिन अभी पूरी तरह से उनकी स्थापना में समय लगेगा। वर्तमान में अफगानिस्तान के सात प्रांतों में लगभग 1800 महिला पुलिसकर्मी तैनात हैं। वर्ष 2015 तक इसे पांच हजार करने और सभी 34 प्रांतों में उनकी तैनाती का लक्ष्य रखा गया है। हाल ही में हुए चुनाव में महिला पुलिसकर्मियों की उपयोगिता सिद्ध हुई है।
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महिला पुलिसकर्मी होना अजूबे से कम नहीं

इंस्पेक्टर शक्ति ने स्वीकार किया कि अफगानिस्तान में बिना सुरक्षा के जिस तरह वे सिविल सोसाइटी में जाकर लोगों को पुलिस व सेना की उपयोगिता के बारे में बताते हैं, वह खतरों से कम नहीं। अकसर हम बिना सुरक्षा के सिविल सोसाइटी के बीच चले जाते थे। उन्होंने कहा कि वहां की महिलाएं महिला पुलिस कर्मी को देख आश्चर्यचकित होती हैं।

क्योंकि वहां महिलाओं को इतनी छूट नहीं है। भाषा से होने वाली समस्या पर शक्ति ने कहा कि वहां पश्तो और घारी भाषा का उपयोग होता है। घारी में कुछ शब्द उर्दू से मिलते जुलते हैं। इससे उन्हें समस्या नहीं होती थी। कुछ शब्द उन्होंने वहां सीख लिए। महिला पुलिसकर्मी तो उन्हें फरिश्ते के रूप में देखती थीं। उनके लिए दूसरे देश में जाकर महिला पुलिसकर्मी का काम करना अनोखे से कम नहीं था।

हैरात में हुई घटना को याद करते हुए कहा कि उनके कैंप से 15 किलोमीटर दूर यूएन कार्यालय पर विस्फोट हुआ था। विस्फोट इतना जबरदस्त था कि उनके कार्यालय से मात्र एक किलोमीटर दूर तक के क्षेत्र में इमारतों के शीशे धमाके की आवाज से टूट गए थे।

इससे पहले इस्तांबुल में यूएन मिशन के तहत कार्य कर चुकी इंस्पेक्टर शक्ति कहती हैं कि वहां और अफगानिस्तान में काफी फर्क है। इस्तांबुल में शांति थी। वहां किसी तरह का डर नहीं था। लोगों का समर्थन प्राप्त था। लेकिन अफगानिस्तान में हालात विपरीत हैं। यहां कब हमला हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता।
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