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संवाद: घुसपैठ की रोक के लिए लद्दाख स्काउट्स की तरह पुंछ, मीरपुर व मुजफ्फराबाद स्काउट्स का हो गठन

Thu, 11 Jan 2024 06:36 PM IST
kumar गुलशन कुमार अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू

सार

अमर उजाला संवाद में शामिल हुए पीओजेके विस्थापितों का कहना था कि उन्हें राजनीतिक रूप से सशक्त बनाए जाने के लिए विधानसभा में पीओजेके के लिए आरक्षित 24 सीटों में से आठ पर नुमाइंदगी का मौका दिया जाना चाहिए।
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संवाद - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जम्मू-कश्मीर में आतंकियों की घुसपैठ पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर ( पीओजेके) के विस्थापितों की मांग है कि लद्दाख स्काउट्स की तरह पुंछ, मीरपुर तथा मुजफ्फराबाद स्काउट्स का गठन किया जाए। इन तीनों स्काउट्स में वहां के विस्थापितों को रखा जाए जो सरहद की रक्षा में मददगार साबित होंगे, क्योंकि सीमा पार से घुसपैठ करने वालों की भाषा को वह बेहतर तरीके से तरीके से समझ सकते हैं।
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अमर उजाला संवाद में शामिल हुए पीओजेके विस्थापितों का कहना था कि उन्हें राजनीतिक रूप से सशक्त बनाए जाने के लिए विधानसभा में पीओजेके के लिए आरक्षित 24 सीटों में से आठ पर नुमाइंदगी का मौका दिया जाना चाहिए। पहाड़ी भाषी का प्रमाणपत्र देकर उन्हें आरक्षण का लाभ भी दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही 2014 में उमर सरकार में पारित कैबिनेट के फैसले को भी लागू किया जाए जिसमें प्रमुख रूप से साढ़े आठ हजार पदों पर भर्ती करने का प्रस्ताव पारित किया गया था। कश्मीरी पंडितों की तरह उन्हें भी सुविधाएं मिलें और उनकी सुध ली जाए। बच्चों को तकनीकी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का लाभ मिले।

वाधवा आयोग की सिफारिश को लागू किया जाए

आए दिन सीमा पार से घुसपैठ होती है। सबसे ज्यादा घुसपैठ पुंछ, मुजफ्फराबाद और मीरपुर वाले इलाके से होती है। हमने सरकार को सुझाव दिया था कि लद्दाख स्काउट की तरह पुंछ, मुजफ्फराबाद और मीरपुर स्काउट का गठन हो और इनमें पीओजेके विस्थापित युवाओं को भर्ती कर इन क्षेत्रों से लगती एलओसी पर तैनात किया जाए। हम आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब देंगे। वाधवा आयोग ने अपनी सिफारिश में पीओजेके विस्थापितों के लिए आठ सीट रखने को कहा था, उसे लागू किया जाए। इससे हमारा प्रतिनिधित्वि होगा और हम अपनी बात रख सकेंगे। पीओजेके विस्थापित पहाड़ी भाषा बोलने वाले लोग हैं, लेकिन शहरों में रहने वाले लोगों को पहाड़ी प्रमाणपत्र नहीं दिया जा रहा है। - राजीव चुन्नी, चेयरमैन, एसओएस इंटरनेशनल
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कैंपों में बुनियादी सुविधा के नाम पर कुछ नहीं

विस्थापन को 75 साल को गए हैं, लेकिन सरकार की तरफ से मदद के नाम पर 5.50 लाख रुपये मिले हैं। सरकार की नीतियों से लगता है कि हमारे साथ खेल खेला जा रहा है। पीओजेके विस्थापित 39 कैंपों में रह रहे हैं, जहां बुनियादी सुविधा के नाम पर कुछ नहीं है। जहां से हम विस्थापित होकर आए हैं, वहां हम एक बड़ी संपत्ति के मालिक थे। हमारे साथ भेदभाव को कम किया जाए। - विनोद कुमार दत्ता, पीओजेके विस्थापित

हमारा दर्द किसी भी विस्थापितों से कहीं ज्यादा

पीओजेके विस्थापितों की दर्द अन्य किसी भी विस्थापितों से ज्यादा है। सरकार को यह समझना चाहिए कि हमने पाकिस्तान को ठुकरा कर भारत को चुना है। हम पांचवीं पीढ़ी में हैं, लेकिन आज भी हमारे बच्चों को न बेहतर शिक्षा और न ही रोजगार है। 30 लाख रुपये प्रति परिवार को देने का फैसला हुआ था, जिसमें से 10 साल में 5.50 लाख रुपये ही मिले हैं। - जगजीत सिंह

विस्थापितों में भेदभाव करने से होता है दर्द

हम विस्थापन का दर्द और दंश को समझते है। ऐसे में हमें किसी अन्य विस्थापितों को दी जा रही सुविधाओं से परेशानी नहीं है, लेकिन जब सरकार विस्थापितों में भेदभाव करती है तो दर्द होता है। कश्मीरी पंडितों से हमारी हमदर्दी है, लेकिन सरकार जिस तरह से उन्हें सुविधाएं दे रही है उसी तरह की सुविधाओं के हम भी हकदार है। -गौरी शंकर

कनीकी शिक्षा में हमारे बच्चों के लिए हो विशेष प्रावधान

विस्थापन का दंश ऐसा है कि 75 साल बाद भी हमारे युवाओं के पास सरकारी नौकरी नहीं है। हमारे बच्चे शिक्षित तो हो जाते हैं, लेकिन रोजगार नहीं होता। तकनीकी शिक्षा में हमारे बच्चों की संख्या न के बराबर है। सरकार तकनीकी शिक्षा में हमारे बच्चों के लिए विशेष प्रावधान रखे, ताकि वह कुशल बन सकें। सरकार जिस तरह कश्मीरी पंडितों को विस्थापित मानती है और उन्हें हर सुविधा दे रही है, उसी तरह हमें भी सुविधाएं दी जाएं। - तिलक राज सेठी
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कश्मीर के अनाथालय में रहा, वहीं था मेरा रिकॉर्ड

मेरे परिवार के 28 लोगों को लाइन में रखकर पाकिस्तानी सेना और कबायलियों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी। मैं मां के साथ जम्मू आया। कुछ समय बाद ही मां की मौत हो गई। बहुत मुश्किल समय देखा है। न मेरे पास न सरकार के पास ऐसा कोई रिकॉर्ड था, जिसमें यह दर्ज हो कि पीओजेके विस्थापित हूं। कश्मीर के अनाथालय में मेरा रिकॉर्ड था, क्योंकि मैं वहां कुछ समय रहा। उस रिकॉर्ड के आधार पर मुझे आर्थिक मदद मिली थी। सरकार हमारी परेशानियों को समझे। - राम सिंह

कागज न होने से मदद से वंचित नहीं रहना चाहिए कोई

मेरा जन्म जम्मू में हुआ। पीओजेके में हम खानदानी लोग थे। विस्थापन के बाद जम्मू आने के बाद हमें सरकार से सिर्फ आश्वासन मिला। सरकार ने 5.50 लाख रुपये की किश्त उन्हीं लोगों को दी, जिनके पास कोई कागज था। ऐसे हजारों लोग पीओजेके के हैं। कोई कागज न होने से वह इस मदद से वंचित नहीं रहना चाहिए। सरकार सभी के बारे में सोचे। - वेद राज बाली

सुनवाई न होने का बड़ा कारण प्रतिनिधित्व न होना

पीओजेके में मीरपुर जिले का रहने वाला था। मेरे दादा वहां गिरदावर थे। हमारे पास लाखों रुपये की जमीन थी। सरकार से अभी तक सिर्फ 5.50 लाख रुपये की किश्त मिली है। घर में दो भाई हैं। बहन है। ऐसे में प्रति व्यक्ति ये पैसा सिर्फ 55 हजार रुपये ही मिला है। हमारी सुनवाई न होने का बड़ा कारण संसद और विधानसभा में हमारा प्रतिनिधित्व न होना है। अगर हम राजनीतिक रूप से सशक्त हो जाते हैं, तो हमारे समुदाय का उत्थान होगा। - रवि दत्ता

सरकार ने हमें सिर्फ लॉलीपॉप दिया

पीओजेके में बिम्बर तहसील में मेरा गांव था। वहां हमारी जमीन, संपत्ति इतनी है कि सरकार द्वारा दिया गया 5.50 लाख रुपये कुछ भी नहीं है। जो सरकार ने हमें दिया, वह सिर्फ लॉलीपॉप है। हमारी सुनवाई न प्रदेश न ही केंद्र में हो रही। कश्मीरी पंडितों को मासिक राहत राशि मिली है, लेकिन हम उसने पहले के विस्थापित हैं। हमें सिर्फ आश्वासन मिला है। - मेला राम

सरकार की नीतियों के प्रति युवाओं में आक्रोश

परिवार ने मुझे पढ़ाया, ताकि मैं उन्हें गरीबी के दलदल से बाहर निकालू, लेकिन हमें सरकारी नौकरी नहीं मिली। निजी क्षेत्र में रोजगार कर रहे हैं। वहां से मिलने वाले वेतन से मुश्किल से परिवार का पालन-पोषण कर पाते हैं। सरकार को परिवार के हर सदस्यों को राहत राशि देनी चाहिए। सरकार की नीतियों के प्रति पीओजेके विस्थापित युवाओं में अब आक्रोश है। अगर सरकार ने ध्यान नहीं दिया, तो हम चुप बैठने वाले नहीं हैं। -दिलीप सिंह चिब

सरकार के पास नहीं है मेरा रिकॉर्ड

मेरे पास रिकॉर्ड है कि मै पीओजेके से हूं, लेकिन सरकार के पास रिकॉर्ड नहीं है। ऐसे में मुझे 5.50 लाख रुपये की किश्त नहीं मिल रही है। मैने सरकार से कहा है कि मेरे पास रिकॉर्ड है, जिसके आधार पर मुझे राहत राशि मिलनी चाहिए। ऐसे 2500 से अधिक परिवार हैं। - दिलीप कुमार
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