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अंत की ओर अलगाववादी सियासत : पाकिस्तान से दानापानी हुआ बंद; स्थानीय नेटवर्क भी टूटा... इसलिए बदल रहा है मन

Thu, 10 Apr 2025 05:50 AM IST
दुष्यंत शर्मा रोली खन्ना, अमर उजाला, जम्मू

सार

गृहमंत्री अमित शाह के तीन दिवसीय दौरे ने इस बात को और पुष्ट कर दिया कि जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी राजनीति का दौर आखिरी सांसें गिन रहा है।
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अमित शाह - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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गृहमंत्री अमित शाह के तीन दिवसीय दौरे ने इस बात को और पुष्ट कर दिया कि जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी राजनीति का दौर आखिरी सांसें गिन रहा है। शाह के श्रीनगर पहुंचने के ठीक पहले रातों-रात तीन अलगाववादी संगठनों ने हुर्रियत से खुद को अलग करने का एलान कर दिया।

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अगले ही दिन इस पर गृह मंत्री की प्रतिक्रिया आई और उन्होंने इसे घाटी के लोगों की भारतीय संविधान में बढ़ती आस्था करार दिया। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक इसे आस्था कम, मौकापरस्ती, बदलती राजनीति और पड़ोसी देश की कंगाली का नतीजा मान रहे हैं। लोकल सपोर्ट सिस्टम यानी ओवरग्राउंड वर्कर (ओजीडब्ल्यू) का नेटवर्क तोड़ने में सुरक्षा एजेंसियों की सफलता के कारण भी इनके हाथ-पांव फूले हुए हैं।

छह अप्रैल को शाह जम्मू पहुंचे थे। तय कार्यक्रमों के बीच कठुआ में जीरो लाइन तक जाकर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने के साथ ही उन्होंने आतंकियों के खिलाफ निगरानी तंत्र को और मजबूत करने का संदेश दिया। वे सात अप्रैल की शाम को ही कश्मीर पहुंच गए थे।

कसा शिकंजा : जमात, हुर्रियत और अन्य अलगाववादी संगठनों के ठिकाने खंगाले, आपत्तिजनक सामग्री जब्त

सुबह उन्हें सुरक्षा को लेकर बैठक लेनी थी। इससे ठीक पहले रात को जम्मू-कश्मीर इस्लामिक पॉलिटिकल पार्टी, जम्मू और कश्मीर मुस्लिम डेमोक्रेटिक लीग और कश्मीर फ्रीडम फ्रंट जैसे तीन और संगठनों ने हुर्रियत से खुद को अलग करने की घोषणा की।

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कोई रास्ता ही नहीं बचा है इनके लिए
जम्मू-कश्मीर व भारत-पाकिस्तान संबंधों के राजनीतिक विश्लेषक संत शर्मा कहते हैं कि यह कोई मन बदलना नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर डंडे के आगे दंडवत होने जैसा है। पाकिस्तान की कंगाली इस कदर बढ़ी है कि इन अलगाववादियों का चैनल ही बंद हो गया है। न तो उन्हें कोई मदद मिल रही है, न ही वे अपने बच्चों का भविष्य वहां भेजकर सुरक्षित कर पा रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियां लगातार इनको स्थानीय सहयोग देने वालों पर सख्त है। ऐसे हालात में उनकी छटपटाहट बढ़ी है, जो उन्हें हुर्रियत से अलग होने पर मजबूर कर रही है।

फ्लैशबैकः मुख्यधारा में लाने के लिए चुनाव मैदान में नजर आए अलगाववादी
फ्लैशबैक में जाएं तो घाटी में अलगाववादी राजनीति हमेशा से हावी रही और इसने मुख्य धारा की राजनीति को एकदम खत्म कर दिया था। 1993 मे ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की स्थापना के साथ अलगाववाद ने घाटी में संगठित रूप लिया था। वर्ष 1996 में चुनावी प्रक्रिया बहाल हुई, इसके बावजूद अलगाववादियों का बोलबाला बना रहा। 

इस दौरान उग्रवाद को तो अस्वीकार किया जाने लगा था, पर अलगाववादियों के खिलाफ सहानुभूति बनी रही। इस सहानुभूति ने मुख्यधारा की राजनीति को लगातार चुनौती दी। 2019 के बाद से हालात बदले। सज्जाद लोन में आया बदलाव इसी प्रक्रिया का हिस्सा रहा। 2024 के चुनाव में अलगाववादियों की जड़ें और कमजोर पड़ीं। 

अफजल गुरु के भाई एजाज गुरु की चुनावों में शिकस्त हो या फिर 2024 के चुनाव में अलगाववादियों के गढ़ में वोटों की बरसात, ये सब बदलाव का संकेत था। सयार अहमद रेशी, तलत माजिद अलाई, जफर हबीब, मोहम्मद फारुक खान, सर्जन बरकाती जैसे अलगाववादी भी खुद को मुख्यधारा में लाने के लिए चुनाव मैदान में नजर आए।

बदलाव की कोशिशें लगातार जारी
चुनाव के नतीजे आने के बाद हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक में भी बदलाव के लिए छटपटाहट दिखी, जो उन्हें दिल्ली तक ले गई। वक्फ बिल के बहाने ही सही वे लंबे समय तक वहां डेरा जमाए रहे। अलग-अलग संगठनों से मिलना, कश्मीरी पंडितों के संगठन से जुड़ने की कोशिशें उनकी इसी बेचैनी को जाहिर करती है।

राजनीतिक विश्लेषक प्रो. रेखा चौधरी कहती हैं कि अलगाववादी राजनीति के लिए अब कहीं कोई जगह नहीं बची है। जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों ने भी इस बात को पहले ही समझ लिया था, तभी उसने चुनाव का रास्ता अख्तियार किया। 

मुख्यधारा की संगठनात्मक राजनीति से जोड़ने की चाहत अलगाववादियों में पैदा हुई। सज्जाद लोन ने भी काफी पहले अलगाववाद का चोला उतार फेंका और अस्तित्व में बने रहने के लिए चुनाव को जरिया बनाया। हुर्रियत से अलगाववादी संगठनों की दूरी यह बता रही है कि अब जम्मू-कश्मीर में इस तरह की राजनीति के लिए कोई जगह नहीं बची है।

क्रांतिकारी बदलाव इधर भी दिखाई दे रहे
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. हरिओम जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक परिदृश्य में क्रांतिकारी बदलावों की बात करते हैं। वह कहते हैं, दो साल में 83,000 से ज़्यादा अन्य प्रदेशों के निवासियों को डोमिसाइल सर्टिफिकेट दिए गए। ये लोग लंबे समय से यहां रह रहे थे, लेकिन अधिकारों से वंचित थे। इतनी बड़ी संख्या में उन्हें प्रमाणपत्र देना, ये जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव का बहुत बड़ा संकेत है।
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