14 अगस्त को मचैल यात्रा के दौरान चिशोती गांव में अचानक आए जलसैलाब ने श्रद्धालुओं को हिला कर रख दिया, कई लोगों की जान चली गई और गांव तबाह हो गया। श्रद्धालुओं ने बताया कि सब कुछ, कुछ ही सेकंड में हुआ, 20 फीट ऊंचा सैलाब पत्थरों और पेड़ों को बहा ले गया।
मचैल यात्रा पर जम्मू, सांबा, कठुआ जिले से आए श्रद्धालु उस मंजर को भूल नहीं पा रहे है, जो 14 अगस्त को उनके आंखों के सामने घटा था। चिशोती गांव में सैलाब से लोगों की मौत, तबाह हो चुके मकान और खौफ के माहौल के बीच अपने घरों को सुरक्षित लौट रहे श्रद्धालु कहते है सब कुछ सेकंड में हुआ, जो जहां था वहीं रह गया। 20 फीट तक ऊंचा सैलाब उसमें तैरते बड़े-बड़े पत्थर और पेड़ देखे। कोई नाला पार कर रहा था कोई पार करने की तैयारी में था जो जहां था वहां से जान बचाने के लिए भागता दिखा।
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उधमपुर निवासी विजय शर्मा मां की छड़ी लेकर मचैल आया था। उन्होंने कहा कि 13 अगस्त को घर से निकले थे। 14 को मां के दर्शन हुए, दोपहर करीब दो बजा आपदा का पता चला। परेशानी तो काफी हुई, लेकिन मां पर विश्वास था। ऐसा मंजर देखने को मिला जो कभी नहीं भूल सकता हूं।
कृष्णा लाल भी उधमपुर से आए थे। उन्होंने कहा सुबह चिशोती गांव में लगे लंगर में नाश्ता किया था। सुबह सात बजे वहां से निकले था उस समय मौसम साफ था। उस समय कोई सोच नहीं सकता था की ऐसी आपदा आएगी। सुभाष चंद्र जम्मू जिले के परगवाल से आए दर्शन करने आए।
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उन्होंने कहा कि हर साल दर्शन करने आते हूं। कभी ऐसा मंजर नहीं देखा था। लंगर में हर समय 100 से 200 तक श्रद्धालु होते थे। आपदा के समय सांबा के आदित्य अपने दोस्तों के साथ चिसोती नाले के आसपास थे। उन्होंने कहा कि सिर्फ एक आवाज सुनाई दी और नाले से अपनी तरफ बड़े-बड़े पत्थर और मलबा आता दिखे।
जो लोग पुल पार कर रहे थे वह बहते दिखे। 20 फीट तक ऊंचा सैलाब थे, उसके सामने इंसान का बचना बहुत मुश्किल था। हम अपनी जान बचा पा इसका विश्वास नहीं हो पाया। सुंदरबनी की सुनीता शर्मा ने कहा कि पहली बार यात्रा पर आई थी। नंगे पांव दर्शन करने आई थी। जब सैलाब आया तो नाले से 500 मीटर की दूरी पर थे। देखते हुए देखते चिसोती गांव का नक्शा ही बदल गया।