आतंकियों की पुनर्वास नीति में बदलाव लगभग तय है। केंद्रीय गृह मंत्रालय इस नीति की समीक्षा कर रहा है। यूपीए शासनकाल में उमर अब्दुल्ला की सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की सहमति से 2010 में यह नीति लागू की थी जो अब तक अर्थहीन साबित हुई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने रियासत सरकार से नीति पर मंतव्य मांगा है।
उधर पीओके में पाकिस्तान ने सख्ती बढ़ा दी है जिससे पूर्व आतंकियों के लिए चोरी-छिपे नेपाल के रास्ते कश्मीर लौटना ज्यादा मुश्किल हो गया है। नीति के तहत अधिकृत रूट से पांच साल में अबतक एक भी आतंकी की वापसी नहीं हो सकी है। अधिकृत रूट से वापसी पाकिस्तान की सहमति से ही संभव है और पाकिस्तान इसकी इजाजत नहीं देता।
गौरतलब है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की मंजूरी के बाद पांच साल पहले बनाई गई नीति के तहत पुंछ-रावलाकोट, उड़ी-मुजफ्फराबाद, बाघा और इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, दिल्ली को आतंकियों की घर वापसी के लिए अधिकृत रूट बनाया गया था।
1100 ने किया वापसी के लिए आवेदन
यह नीति वैसे पूर्व आतंकियों के पुनर्वास के लिए है जो 1990 के दशक में हथियारों का प्रशिक्षण लेने पीओके चले गए थे और अब कश्मीर वापस लौटना चाहते हैं। पीओके में ऐसे आतंकियों की संख्या चार हजार से अधिक है। इनमें से 1100 आतंकियों के परिवार वालों ने कश्मीर वापसी के लिए जम्मू कश्मीर सरकार के पास आवेदन कर रखा है।
नीति के तहत वापसी के बाद आतंकियों को पुनर्वास पैकेज का प्रावधान है। राहत और रियायतों के लिए आतंकियों की वापसी अधिकृत रूट से होना जरूरी है। चूंकि अधिकृत रूट से एक भी आतंकी का वापसी नहीं हुई है इसलिए नेपाल रास्ते से वापस लौटने वालों को कोई सुविधा नहीं दी गई है।
भाजपा शुरू से इस नीति के खिलाफ रही है। आतंकियों में से अधिकांश ने पीओके में निकाह कर लिया है नतीजतन वे अपने परिवार के साथ वापसी चाहते हैं। नेपाल का रास्ते अबतक 323 आतंकी अपने परिवार के साथ कश्मीर लौटे हैं। नेपाल के रास्ते लौटने वाले आतंकियों के परिवार वाले पहले रियासत सरकार को सूचना देते हैं।
पीओके से शुरू हुई फंडिंग
इस सूचना के बाद रियासत सरकार उनकी सुरक्षा की व्यवस्था करती है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के जम्मू कश्मीर सेल के माध्यम से उन्हें कश्मीर लाया जाता है। आतंकी लियाकत अली की पीओके से वापसी के क्रम में दिल्ली में हुई गिरफ्तारी में दिल्ली पुलिस पर लगे आरोपों के बाद यह व्यवस्था विकसित की गई थी।
गृह विभाग के सूत्रों के मुताबिक अब आतंकियों के परिवार वाले वापसी के लिए रियासत सरकार से संपर्क नहीं कर रहे हैं। इस साल चार महीने में नेपाल रूट से सिर्फ एक आतंकी की वापसी हुई है जबकि पिछले साल 95 आतंकियों की परिवार के साथ वापसी हुई थी।
सूत्र बताते हैं कि पुनर्वास पैकेज नहीं मिलने के कारण आतंकियों की वापसी कम हो रही है। इसके अलावा अब पीओके में उन्हें फंडिंग शुरू हो गई है। 2010 से 2014 तक पाकिस्तान की एजेंसियों द्वारा फंडिंग नहीं होने के कारण आतंकी कश्मीर वापसी के लिए प्रयासरत थे। अब वापसी के लिए उनकी दिलचस्पी घटी है।