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भरोसे लायक नहीं ड्रैगन, एलएसी पर निशानदेही जरूरी

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जम्मू। पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर दोनों ओर से सेनाओं की वापसी की खबरों के बीच सरहदी बाशिंदे अभी भी आशंकित हैं। एलएसी से बिल्कुल नजदीक के कई गांवों में हफ्तों से ब्लैकआउट है। रात को पहाड़ों से चीनी सैनिक गांव की ओर सर्चलाईट चलाते हैं। कभी पैंगोंग तो कभी श्योक नदी में पीएलए के सैनिक मोटर बोट लेकर पहुंच जाते हैं। 5 मई के बाद से ऐसे हालात देखते आ रहे सरहदी बाशिंदे स्थायी हल चाहते हैं।
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एलएसी पर चुशुल के प्रतिनिधि और लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के कार्यकारी पार्षद कोनचोक स्टेन्जिन ने कहा कि एलएसी की निशानदेही होना जरूरी है। चीन आए दिन घुसपैठ करता है। कई चरागाह उसके कब्जे में है। वहीं एलएसी पर सबसे संवेदनशील गलवां, श्योक और दौलत बेग ओल्डी इलाकों की नुमाइंदगी कर रहे तंगसे के पार्षद ताशी नामग्याल ने कहा कि चीन चालबाज देश है। इससे पहले भी चीन ने एक जगह कब्जा किया। बातचीत से पीछे हटा तो दूसरी जगह को कब्जा लिया। सेनाएं हटने की सूचना राहत भरी है लेकिन यहां के लोग अपनी लाइफलाइन चरागाह चाहते हैं। स्थायी हल होने तक यह अधूरी राहत होगी।
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लद्दाख में कब-कब हफ्तों चली तनातनी
चीनी सैनिकों के एलएसी के इस पार आने की घटनाएं दर्जनों बार हो चुकी हैं, लेकिन पिछले आठ साल में ये चौथा और सबसे बड़ा टकराव है।
15 अप्रैल 2013 : दुनिया के सबसे ऊंचे एयरबेस वाले क्षेत्र दौलत बेग ओल्डी में चीनी सैनिक घुस आए। अपने टेंट भी लगा दिए। राजनयिकों और दूतावास स्तर की बैठकों से 21 दिन बाद गतिरोध खत्म हुआ।
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दौलत बेग ओल्डी पर तनाव खत्म हुआ ही था कि मई 2013 में चीनी सैनिकों ने चुमार में घुसपैठ कर अपने टेंट लगा लिए। चुमार में भी हालात सामान्य होने में तीन सप्ताह लगे।
10 सितंबर 2014 : चीनी सैनिक मशीनरी के साथ डेमचोक आकर सड़क बनाने लगे। इसे रुकवाया गया। मंत्रालय स्तर पर डेमचोक की तनातनी को 20 दिन बाद खत्म किया जा सका।
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