हलमतपोरा इलाके में आतंकियों से लड़ते हुए शहादत को प्राप्त होने वाले जवान अशरफ राठर की अपनी कंपनी कमांडर से आखिरी शब्द यही थे कि 'साहब इनको छोड़ना नहीं है'। अशरफ सेना की ट्यूटोरियल आर्मी (टीए) के जवान थे।
कुपवाड़ा के हलमतपोरा के जंगलों में आतंकियों के साथ मुठभेड़ के दौरान भारत माँ के इस वीर सपूत के पेट में उसे गोली लगने के बाद भी उसने हार नहीं मानी और आतंकवादियों से लड़ते रहे। अपने 15 साल की सेवा के दौरान उन्हें कई मुठभेड़ों का अनुभव था।
सेना के एक अधिकारी ने बताया कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद हो आतंकियों के साथ लड़ते रहे। उन्होंने कई अभियानों का नेतृत्व भी किया। पिछले साल नवंबर में जुरहमा जंगल में तीन लश्कर-ए-तैयबा आतंकवादी से हुई मुठभेड़ भी शामिल है।
इसमें एक सैनिक भी शहीद हो गया था। वह सेना के अन्य जवानों के लिए प्रेरणा समान थे। उनके इस बलिदान के लिए भारतीय सेना उन्हें सदैव याद रखेगी। गौरतलब है कि 48 घंटे तक हलमतपोरा मुठभेड़ में लश्कर के पांच आतंकी मार गिराए गए थे। इस आपरेशन में पांच जवान भी शहीद हो गए थे। इसमें से दो जम्मू-कश्मीर पुलिस और तीन सेना के जवान थे।
उनके पास से 5 एके-47 राइफल, 25 एके मैगजीन, 800 एके राउंड, 2 पिस्तौल, 3 वायरलेस सेट, 2 वाईएसएम रिसीवर, पाउच, हैंड ग्रेनेड्स, पाक मेड दवाइयां, ड्राई फ्रूट बरामद हुए हैं। साथ ही जिहादी दस्तावेज भी मिला है।
एसएसपी शमशेर हुसैन ने बताया कि अगर आतंकी घाटी में और अंदर घुसने में कामयाब हो जाते तो काफी नुकसान पहुंचा सकते थे। बताया कि मारे गए आतंकी प्रशिक्षित थे। हुसैन ने बताया कि जानकारी थी कि आतंकियों का एक दल घुसपैठ करेगा जिसके चलते पहले से ही जिले के कई इलाकों में सर्विलांस बढ़ दी गयी थी।