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मैं कश्मीरी पंडित हूं 1990 में घर छोड़ना पड़ा, आज भी गांव यादों में बसा हैं, पढ़ें अनसुने किस्से

Wed, 04 Sep 2019 12:53 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
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कश्मीरी पंडित, फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर के उन बाशिंदों की खुशी के आंसूओं को शायद ही कोई देख पा रहा होगा, जो बचपन में घर छोड़ कर दरबदर होने को मजबूर हुए थे। ऐसे ही दर्द को कश्मीर की रहने वाली कश्मीरी पंडित महिला नीरू भट्ट ने अमर उजाला को पत्र लिखकर साझा किया। नौ साल की उम्र में उन्हें घर छोड़ना पड़ा था और आज वह आठ साल की बेटी के साथ पुणे में रह रही हैं। वह इंफोसिस में बतौर प्रोजेक्ट मैनेजर काम कर रही हैं। उनके पत्र और कविता के कुछ अंशों को हम आपसे साझा कर रहे हैं।

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मैं एक कश्मीरी पंडित हूं, और जब अनुच्छेद 370 को खत्म किया गया, तब मैंने ‘मेरा घर कश्मीर’ नाम से एक कविता लिखी। 1990 में कश्मीर में आतंकवाद बढ़ने के कारण हम सब कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ना पड़ा। उस समय मैं महज नौ साल की थी और मैंने आखिरी बार अपने घर को तभी देखा था। उसके बाद मैंने आज तक अपना घर नहीं देखा, लेकिन मेरे घर, मेरे गांव की तस्वीर आज भी मेरी यादों में ताजा है।

पिछले 30 साल के हालात से मैंने घर वापसी की उम्मीद छोड़ ही दी थी, लेकिन पांच अगस्त 2019 को जब अनुच्छेद 370 और 35ए को खत्म किया गया, तब मुझे घर वापसी की एक उम्मीद नजर आई और मैंने अपने सामने इतिहास बनते देखा। उस दिन मुझे अपने उन सहकर्मियों और दोस्तों की तरफ से फोन आया जो कश्मीरी समुदाय से नहीं थे और वे जानना चाहता थे कि मैं उस दिन कैसा महसूस कर रही हूं।

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मैं उस दिन कुछ समय के लिए नि:शब्द थी और मेरी आंखें नम थीं

मैं उस दिन कुछ समय के लिए नि:शब्द थी और मेरी आंखें नम थीं। उस समय मैं सिर्फ अपने कश्मीर के घर और मंदिर के बारे में सोच रही थी, जिसके बाद मैंने अपनी मातृभूमि से संबंधित अपने सारे भाव इस कविता में लिख दिए। मैं इस समय अपने पति और आठ साल की बेटी के साथ पुणे में रह रही हूं और इंफोसिस में बतौर प्रोजेक्ट मैनेजर काम कर रही हूं।

कविता के कुछ अंश

आज हवा ने मेरे बंद घर का दरवाजा खोला होगा
मेरे आने की उम्मीद है, खुश होकर वो बोला होगा।
मेरे घर की खिड़कियां भी, खुल गई होंगी अपने आप
और मेरी किताबों पर पड़ी धुल उड़ गई होगी।

बाग की तितलियां मुझसे मिलने आई होंगी
खिड़की पर बैठे बुलबुल भी चहक रहे होंगे,
मेरी नदी के झरने, मेरा नाम पुकार रहे होंगे
मेरे आंगन के पेड़ भी खुशी से झूम रहे होंगे।
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