मैं उस दिन कुछ समय के लिए नि:शब्द थी और मेरी आंखें नम थीं। उस समय मैं सिर्फ अपने कश्मीर के घर और मंदिर के बारे में सोच रही थी, जिसके बाद मैंने अपनी मातृभूमि से संबंधित अपने सारे भाव इस कविता में लिख दिए। मैं इस समय अपने पति और आठ साल की बेटी के साथ पुणे में रह रही हूं और इंफोसिस में बतौर प्रोजेक्ट मैनेजर काम कर रही हूं।
कविता के कुछ अंश
आज हवा ने मेरे बंद घर का दरवाजा खोला होगा
मेरे आने की उम्मीद है, खुश होकर वो बोला होगा।
मेरे घर की खिड़कियां भी, खुल गई होंगी अपने आप
और मेरी किताबों पर पड़ी धुल उड़ गई होगी।
बाग की तितलियां मुझसे मिलने आई होंगी
खिड़की पर बैठे बुलबुल भी चहक रहे होंगे,
मेरी नदी के झरने, मेरा नाम पुकार रहे होंगे
मेरे आंगन के पेड़ भी खुशी से झूम रहे होंगे।