जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने शुक्रवार को कहा कि बीफ बैन मुद्दे पर विचार राज्य सरकार और विधायिका को करना चाहिए।
गोजातीय वध और मांस बिक्री के कानून को सख्ती से लागू करने के अदालत के निर्देशन को एक तरफ रखते हुए मुद्दे पर यथास्थिति बनाने को कहा।
जस्टिस मुजफ्फर हुसैन अत्तर, अली मोहम्मद मागरे और ताशी रबस्तन की पीठ, जिन्होंने वास्तव में यथास्थिति को बहाल करने का फैसला लिया, को श्रीनगर और जम्मू हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में मतभेद के कारण विभाजित होने के बाद गोमांस प्रतिबंध समस्या को हल करने के लिए पांच अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट से कहा गया था।
कोर्ट द्वारा नौ सितंबर को जम्मू बेंच को चुनौती देने वाली याचिका को भी खारिज किया, जिसमें राज्य में गोजातीय वध और मांस बिक्री पर लगे प्रतिबंध को विनियमित करने के लिए मौजूदा कानूनों (जम्मू-कश्मीर रणबीर दंड संहिता की धाराएं 298ए से डी तक) को सख्ती से लागू करने के लिए राज्य पुलिस को निर्देशित किया गया था।
रैणा ने कहा नहीं होने देंगे गोवध
गौरतलब है कि राज्य सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के बाद सदन में भी इस मुद्दे को लेकर हंगामा हुआ। अब देखना यह होगा कि जम्मू में होने वाला सत्र कैसा रहेगा।
वहीं, भाजपा विधायक रविंद्र रैना ने सरकार के पाले में उच्च न्यायालय द्वारा गेंद डालने पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य में वर्ष 1932 से गोजातीय वध और मांस की बिक्री पर प्रतिबंध था, डोगरा शासकों के दौरान भी प्रतिबंध था।
राज्य के संविधान में भी इसे अपराधिक माना गया है। उन्होंने कहा कि अब जब इस पर हमें फैसला लेना होगा, तो अगर सदन में इस पर चर्चा होगी, तो हम पूरा जोर देंगे इस कानून को और मजबूत करने का।
रैना ने कहा कि हम बलिदान दे देंगे, लेकिन इस कानून में बदलाव कर गो माता का अपमान नहीं होने देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में कुरुक्षेत्र का मैदान बन जाएगा, अगर कुछ गलत हुआ तो।