हाईकमान को जम्मू-कश्मीर में प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ने के लिए मजबूत चेहरा सामने लाने की जरूरत होगी। आजाद की सहमति से ही प्रदेश में विकार रसूल को नए अध्यक्ष पद की कमान मिली है, लेकिन आजाद के अब चले जाने के बाद रसूल की चुनौतियां भी बढ़ गई हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने आगामी विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता सहित सभी पदों से इस्तीफा देकर सियासी दलों को हैरत में डाल दिया है। पार्टी हाईकमान ने हाल ही में प्रदेश कांग्रेस समिति में सात नई समितियों का गठन करके प्रमुख रूप से आजाद को अपना चेहरा बनाने की कोशिश की थी, लेकिन आजाद के अचानक पार्टी छोड़ने के फैसले से सारी परिस्थितियां बदल गई हैं।
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अब हाईकमान को जम्मू-कश्मीर में प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ने के लिए मजबूत चेहरा सामने लाने की जरूरत होगी। आजाद की सहमति से ही प्रदेश में विकार रसूल को नए अध्यक्ष पद की कमान मिली है, लेकिन आजाद के अब चले जाने के बाद रसूल की चुनौतियां भी बढ़ गई हैं।
अंदर खाते उनके खिलाफ पहले ही पार्टी के भीतर विरोध के स्वर उभर रहे हैं। पार्टी के अहम पदों में जगह न देने से कई वरिष्ठ नेता खफा हैं। बताया जाता है कि आजाद ने कई नाम सुझाए थे, जिस पर पार्टी हाईकमान ने उनकी सिफारिश पर अमल करते हुए विकार रसूल को नया अध्यक्ष बनाया है।
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रसूल को भी आजाद का पूरा समर्थन मिलने की उम्मीद थी, लेकिन उनके इस्तीफे के बाद अब सियासी समीकरण बदल गए हैं। आजाद के अब पार्टी में शामिल न रहने के कारण रसूल के खिलाफ विरोध के स्वर उठ सकते हैं। अमर उजाला ने शुक्रवार को रसूल से फोन पर कई बार बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया।
आजाद के साथ उनके कई समर्थक नेताओं के इस्तीफे के बाद प्रदेश कांग्रेस के लिए बनाई गई नई समितियों में और लोगों को शामिल किया जा सकता है। इन समितियों में आजाद सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने अपना पद छोड़ दिया है।
30 अगस्त को पाटिल और रसूल जम्मू आएंगे
शहीदी चौक स्थित प्रदेश कांग्रेस समिति के मुख्यालय में शुक्रवार को हुई तैयारी बैठक में 30 अगस्त को जम्मू कश्मीर मामलों की प्रभारी रजनी पाटिल और नवनियुक्त अध्यक्ष विकार रसूल के स्वागत की तैयारियों की समीक्षा की गई। बैठक की अध्यक्षता करते हुए कार्यकारी अध्यक्ष रमण भल्ला ने कहा कि कांग्रेस पार्टी को जनकल्याण के दुश्मन और भाजपा की जनविरोधी नीतियों खिलाफ एकजुट होना है। जम्मू कश्मीर में हजारों अस्थायी कर्मचारी अपनी मांगों के लिए सड़क पर हैं। लेकिन प्रशासन को कोई लेना देना नहीं है।