साल 2024 की सर्वे रिपोर्ट में बताया-भविष्य के बारे में सुरक्षित और आशावादी नहीं हैं युवा
- 16 फीसदी उदास और अप्रसन्न, 18 फीसदी को स्कूल के काम का तनाव, 25 फीसदी अकेलेपन के शिकार
श्रीनगर। जम्मू और कश्मीर में कई छात्र तनाव और अकेलेपन से घिरे हैं। कई युवा भविष्य के बारे में सुरक्षित और आशावादी नहीं हैं। कुछ उदास रहते हैं तो कुछ को स्कूल के काम का तनाव रहता है। शिक्षा मंत्रालय की साल 2024 की सर्वेक्षण रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है।
रिपोर्ट में लिखा है, ''शिक्षकों के एक समूह का मानना था कि सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा उनकी भूमिका से परे है और कुछ ने छात्रों की भावनाओं को समझने में कठिनाई की बात कही।'' शिक्षा मंत्रालय ने रिपोर्ट में कहा कि ये निष्कर्ष स्कूलों में अधिक संवेदनशील और भावनात्मक रूप से सहायक वातावरण बनाने की आवश्यकता को उजागर करते हैं।
सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा से संबंधित कई क्षेत्रों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। रिपोर्ट के अनुसार जम्मू और कश्मीर में 16 प्रतिशत छात्र उदास या अप्रसन्न महसूस कर रहे हैं जबकि 18 प्रतिशत छात्र अपने स्कूल के काम को लेकर तनावग्रस्त या चिंतित महसूस कर रहे हैं। 25 प्रतिशत छात्रों को तनावग्रस्त या परेशान होने पर किसी से बात करना आसान या सहज नहीं लगता और 20 प्रतिशत छात्रों को लगता है कि उन्हें कक्षा के बाहर भी बहुत अधिक काम या गतिविधि करनी पड़ती है।
इसमें यह भी कहा गया है कि 17 प्रतिशत छात्रों को स्कूल न जाने का मन करता है और 18 प्रतिशत शिक्षक कक्षा में छात्रों के बीच किसी भी विवाद को सुलझाने में सक्षम नहीं हैं। इसमें लिखा है 33 प्रतिशत शिक्षक इस बात से सहमत हैं कि छात्रों की सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा शिक्षक के हाथ में नहीं है और तीन प्रतिशत शिक्षक यह नहीं समझ पाते कि कक्षा में प्रत्येक छात्र क्या महसूस करता है।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि कम से कम 15 प्रतिशत छात्र चिंतित या बेचैन महसूस कर रहे हैं और 17 प्रतिशत छात्र अलग-थलग या अकेला महसूस कर रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 13 प्रतिशत छात्र भविष्य के लक्ष्यों को प्राप्त करने की क्षमता को लेकर आशावादी नहीं हैं और 13 प्रतिशत छात्र अपने वर्तमान परिवेश में सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं।''
शिक्षा मंत्रालय ने कहा कि सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा (एसईएल) छात्रों के कल्याण और शैक्षणिक सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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अभिभावकों को बढ़ानी होगी बच्चों से नजदीकी : डॉ अबरार
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। श्रीनगर के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. मोहम्मद अबरार ने कहा कि ये संकट हर दिन सामने आते हैं। उन्होंने कहा कि जब छात्र इलाज के लिए आते हैं वे पढ़ाई के बारे में बात नहीं करते। वे सीने में दर्द, अनिद्रा, घबराहट के दौरे (पैनिक अटैक) और अत्यधिक चिंता के बारे में बात करते हैं। कुछ ऐसे छात्र होते हैं जो पढ़ाई के लिए घरों से दूर शहरों में आते हैं। कमरों में आजादी से ज्यादा अकेलेपन की बू आती है। उन्होंने कहा कि छात्रों पर घर वालों का भी दबाव होता है। असली वजह-अत्यधिक चिंता और अकेलापन है।
डॉ. अबरार छात्रों पर समाज का दबाव, देखो-देखी, एक दूसरे के साथ तुलना करनी और फिर परिवार का दबाव-यह सब कारण एक साथ मिलकर इकट्ठा दबाव बनाते हैं। उन्होंने कहा कि हम ऐसे छात्रों को ''इनविजिबल ड्रॉपआउट'' कहते हैं जो परीक्षा में फेल नहीं हुए हैं। परीक्षा से बहुत पहले ही मानसिक रूप से पढ़ाई छोड़ चुके हैं। उन्होंने कहा कि वे (छात्र) अपनी भावनाओं को दबाते हैं, कमजोरी को कमजोरी मानते हैं। कई लोग चुपचाप सहते हैं, बहादुरी का दिखावा करते हैं। डॉ. अबरार ने कहा कि कुछ छात्र धूम्रपान, भांग का सेवन, डॉक्टर के पर्चे वाली शामक दवाओं का दुरुपयोग या ऑनलाइन लत के शिकार हो जाते हैं। वे अपराधी नहीं हैं - वे बिना किसी सहायता प्रणाली के थके हुए बच्चे हैं।