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कश्मीर की कब्रों पर बोलते पत्थर!

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अगर लफ्ज बोलते हैं तो कब्रों के सिरहाने लगे ये पत्थर कभी चीखकर और कभी सरगोशी से कई कहानियां कह जाते हैं।
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कहानी एक नौजवान की बेवक्त मौत की, किसी के गोली या हिंसा के शिकार होने की, या फिर औलाद के लिए मां-बाप के बेपनाह मोहब्बत की।

किसने कहा कि इतिहास या मोहब्बतों की दास्तानें महज कागजों पर दर्ज की जा सकती हैं! कश्मीर में इतिहास के हिस्से कब्रों के सिरहाने लगे पत्थरों में भी दर्ज हैं।

कोई मौजूद न भी हो तो शायद ये समझने में देर नहीं होगी ये उस मां-बाप की दर्द भरी चीख है जिनका बेटा मात्र 15 साल की उम्र में उनसे सदा के लिए जुदा हो गया।
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कब्र के सिरहाने पत्थर पर लगा ये शेर उसे साफ बयान करता है-

मासूम हो तुम शहीद जिंदा जावेद हो,
तुम जावेद ही नहीं बद्र की तस्वीर हो।

कब्रों पर पत्‍थर की पुरानी है परंपरा

कब्रों के सिरहाने शेर लिखने की परंपरा कब, कैसे और क्यों शुरू हुई इसे लेकर कहीं कुछ लिखा हुआ नहीं मिलता। लेकिन एक क‌िस्सा बताया जाता है सूफी संत सैयद अली हमदानी से जुड़ा हुआ।

उनके प्रभाव में जब इस्लाम कश्मीर में तेजी से फला फूला तो मूर्तियां तैयार करने वालों के रोजगार पर इसका भारी असर पड़ा। सूफी संत ने उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया कि वो अपनी कला को निखारने का कोई दूसरा साधन ढूंढ़े।

हालांकि ऐसा नहीं कि इस तरह के पत्थर घाटी के हर कब्रिस्तान में मिलते हैं। कुछ लोग इसे गलत भी बताते हैं। लेकिन ज्यादातर जगहों पर इसे लगाने का रिवाज है।

लहू का तोहफा
श्रीनगर की ईदगाह के बगल में मौजूद कब्रिस्तान को लोग शहीद मजार के नाम से जानते हैं। यहां वैसे लोगों की कब्रें मौजूद हैं जो हिंसा के शिकार हुए हैं। वहीं एक कब्र पर शेर लिखा है जो बात कर रहा है धरती पर अपने लहू को निछावर करने की-

तू अपने फूलों को सुर्ख कर ले सवाल है तेरी आबरू का,
कबूल कर ए जमीने गुलशन हकीर (तुच्छ) तोहफा मेरे लहू का।

मरने वालों की जबीं (पेशानी) रौशन है इस खल्क (दुनियां) में,
जिस तरह तारे चमकते हैं अंधेरी रात में।

कारीगर खुद ही कुछ शेर सुझाते हैं

श्रीनगर के पांता चौक पर पत्थरों का काम करने वाले वसीम अहमद शाह कहते हैं कि पहले स्लेटी पत्थरों के प्रयोग का रिवाज था लेकिन अब धीरे-धीरे लोग मार्बल की मांग करने लगे हैं।

उनके मुताबिक लोग खुद से शेर लाकर देते हैं जिसे मांग के अनुसार या तो सीधे पत्थर पर खोदा जाता है या फिर कंप्यूटर की मदद से डिजाइन कर फिर ट्रेसिंग पेपर के सहारे पत्थर पर उतारा जाता है।

बुलबुल की गुलशन
कई बार वैसे लोग भी कारीगरों के पास आते हैं जिन्हें शेरों-शायरी से दूर का वास्ता नहीं होता। उस हालत में कारीगर खुद ही उन्हें कुछ शेर सुझाते हैं।

वसीम अहमद शाह अक्सर ये दो शेर लोगों को बताते है-

'आए थे हम मिस्ले बुलबुल सैर गुलशन कर चले
ले लो माली बाग अपना हम तो अपने घर चले।'

ये दूसरा शेर कुछ धार्मिक भावनाओं वाला है जो कयामत यानी प्रलय के दिन की बात करता है।

'नबी की रहमत हो तुझपे, खुदा की शिफाअत हो,
रोजे महशर में आप पर अल्लाह की रहमत हो।'
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गरीबों की मजार पर न चराग है, न फूल है

कई बार कारीगर पहले से ही ऐसे पत्थर तैयार करके रखते हैं। फारसी भाषा में लिखे गए इस शेर का मतलब है-

हम गरीबों की मजार पर न चराग है, न फूल है
चूंकि न दिया है और न ही फूल तो न परवाना यहां आकर जलता है न ही बुलबुल यहां आती है।

इस तरह के टूंबस्टोन तैयार करने में कारीगर को तीन से छह घंटे का वक्त लग जाता है। वो इस काम के लिए छह सात सौ रूपये से लेकर 1200 रूपये तक मेहनताना लेते हैं।

शबनम की आफशानी
श्रीनगर शहर में ही इस तरह की दुकानें कई इलाकों में मिल जाती हैं।

कई में पत्थर के दूसरे कामों के साथ इस तरह के टूंबबस्टोन तैयार करने का काम भी किया जाता है।

मोहम्मद नसीर बच्चू मैट्रिक पास हैं लेकिन अल्लामा इकबाल के शेर फर्राटे से बोलते हैं। बातों-बातों में उन्होंने ये शेर सुना डाला-

'आसमां तेरी लहद (कब्र) पर शबनम आफशानी करे,
सब्ज-ए- नौरुस्ता उस घर की निगहबानी करे।'
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