पिछले साल सितंबर में आई बाढ़ से हुए नुकसान से पस्त कश्मीरी किसान केसर को लेकर दोहरी मार झेल रहे हैं। पिछले कुछ साल में पैदावार तो घटी ही है, ईरान से आने वाले केसर की मौजूदगी की वजह से कश्मीरी केसर के दाम गिर गए हैं। इसके अलावा ईरानी केसर को कश्मीरी केसर के नाम से भी बेचा जा रहा है।
भारत केसर के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है और कश्मीर का इसमें खास योगदान है। कश्मीर घाटी में 3,200 हेक्टेयर जमीन पर केसर की खेती होती है। मुख्य क्षेत्र पम्पौर और बड़गाम जिला है। पिछले कुछ सालों से कश्मीर में बारिश और बर्फबारी घटी है जिससे केसर की पैदावार कम हो रही है और कश्मीर में ईरानी केसर अपनी जगह बना रहा है जिसकी कीमत कश्मीरी केसर से कम होती है।
कश्मीर केसर एसोसिएशन के अध्यक्ष अब्दुल मजीद वाणी के मुताबिक़ बाजार में ईरानी केसर पर कश्मीरी लेबल लगा कर सैलानियों को बेचा जाता है। ऐसा कश्मीर से बाहर भी किया जाता है। वह कहते हैं, 'ईरानी केसर जबसे कश्मीर आना शुरू हुआ तब से स्थानीय माल के भाव गिरने शुरू हो गए।
आयात किए गए माल के दाम कम होते हैं।' इस समय कश्मीर में 1,500 रुपये प्रति 10 ग्राम की दर से केसर बेचा जा रहा है जबकि चार साल पहले इसके दाम 2,500 से 3,000 तक थे। वाणी कहते हैं, 'कारोबार को नुकसान तो अपनी जगह है लेकिन इस वजह से कश्मीर के केसर उद्योग को बुरा नाम मिल रहा है। इसके अलावा खरीदारों को भी धोखा दिया जा रहा है।' इस वर्ष कश्मीर घाटी में सिर्फ 25 से 27 करोड़ फसल की पैदावार हुई है जबकि औसत पैदावार 125 से 130 करोड़ तक होती है।