शहरी स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव पर कश्मीर हिंसा का काला साया पड़ गया है। राज्य चुनाव विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार कश्मीर में कानून व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए इस साल चुनाव करवाना सरल नहीं होगा।
आधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार राज्य चुनाव विभाग की ओर से शहरी स्थानीय निकाय चुनाव के लिए मतदाता सूचियों से लेकर आरक्षित वार्डों की अधिसूचना जारी कर दी गई थी। सियासी दलों की ओर से भी उम्मीदवारों की सूचियां तैयार करने का काम जारी था। कश्मीर हिंसा की वजह से अब सब अधर में लटक गया है।
जम्मू-कश्मीर में 37 साल के अंतराल के बाद 2011 में पंचायत चुनाव हुए थे और पंचायतों का कार्यकाल 17 जुलाई, 2016 को पूरा हो गया। इसी तरह रियासत में 26 साल के अंतराल के बाद शहरी स्थानीय निकाय चुनाव 2005 में हुए थे और कार्यकाल 2010 में पूरा हो गया था। पिछले छह साल से निकाय चुनाव लटकते आ रहे हैं।
आठ जनवरी से तीन अप्रैल, 2016 तक रियासत में रहे राज्यपाल शासन के दौरान मई के पहले सप्ताह में चुनाव करवाने की तैयारी कर ली गई थी। हालांकि चार अप्रैल को मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की अगुवाई में पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार बनने के बाद चुनाव सितंबर-अक्तूबर में करवाए जाने की तैयारी हुई थी। कश्मीर में बिगड़े हालात के बाद से कानून एवं व्यवस्था की स्थिति फिलहाल चुनाव लायक नहीं है।
शहरी स्थानीय निकाय और पंचायती चुनाव के लिए तैयारी की गई थी। चुनाव विभाग ने प्रबंधों को लगभग पूरा कर लिया था। कश्मीर में हालात खराब होने के चलते अब चुनाव पर फैसला राज्य सरकार को लेना है। - शांतमनु, मुख्य चुनाव अधिकारी, जम्मू-कश्मीर