प्रमुख अलगाववादियों से नजरबंदी हटाने के राज्य सरकार के फैसले को केंद्रीय वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा से बातचीत के लिए माहौल तैयार करने की पहल के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि अलगाववादी खेमे में सेंध लगाने के लिए ही यह कदम उठाया गया है।
केंद्रीय वार्ताकार की ओर से सरकार के इस कदम का स्वागत किए जाने से भी यह माना जा रहा है कि वार्ताकार अलगाववादी खेमे को इसी बहाने बातचीत के लिए साधने में जुटे हैं। वार्ताकार की पहल पर ही राज्य सरकार ने यह फैसला किया है।
नजरबंदी हटाने के फैसले से यह माना जा रहा है कि अंदरखाने खिचड़ी पक रही है। पहले भी केंद्रीय वार्ताकार ने अलगाववादियों से बातचीत प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश की थी, लेकिन अब तक इसमें कामयाबी नहीं मिल पाई थी।
चर्चा रही कि पिछले दिनों अपने दौरे के दौरान वे अलगाववादी प्रो. भट से मुलाकात करने में कामयाब रहे थे, लेकिन अन्य प्रमुख अलगाववादियों से बातचीत करने में सफलता नहीं हासिल हुई थी। उधर, नजरबंदी हटाने के फैसले का स्वागत करते हुए केंद्रीय वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार को चाहिए कि वह गिलानी तथा उनकी कंपनी को लोगों से निर्बाध रूप से बातचीत की छूट दे।
सरकार उन्हें बिना किसी व्यवधान के घूमने तथा विचारों को रखने की अनुमति दे। उन्हें अपनी बात रखने में कुछ भी गलत नहीं है, बशर्ते कानून-व्यवस्था की स्थिति न पैदा होने पाए। यह सरकार पर निर्भर है कि वह गिलानी तथा अन्य से कानून व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न होने पर कैसे निपटेगी।
एक प्रश्न के जवाब में कहा कि यह हुर्रियत को फैसला करना है कि वह उनसे बात करेगी या नहीं। वह कैसे उन्हें बाध्य कर सकते हैं। यह उन पर निर्भर है कि वे बातचीत के लिए तैयार हों तो सामने आएं। यह पूछे जाने पर कि क्या उनकी संस्तुतियां लागू होंगी तो उन्होंने कहा कि पत्थरबाजों से मुकदमा हटाए जाने का निर्णय लागू हो चुका है। जल्द ही बड़ा बदलाव नजर आएगा।
गिलानी से आठ साल बाद नजरबंदी हटी है। डीजीपी ने कहा है कि हुर्रियत (जी) प्रमुख सैयद अली शाह गिलानी, हुर्रियत (एम) प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक तथा जेकेएलएफ प्रमुख यासीन मलिक अब कहीं भी आने जाने को स्वतंत्र हैं।
अगर कश्मीर को विवादित क्षेत्र मानते हुए, यूएन प्रस्तावों को ध्यान में रखते हुए और आत्मनिर्णय के अधिकारी को दायरे में रखते हुए कोई टेबल सजेगा तो हमें कोई एतराज नहीं है। अगर सरकार को लगता है कि रिहाई के बाद गिलानी खामोश हो जाएं और कश्मीर की आजादी को लेकर कोई भाषण न दें तो यह संभव नहीं है। जब तक लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए कोई फैसला नहीं होगा तब तक किसी नतीजे तक नहीं पहुंच सकते।- मो. अशरफ सेहरई, चेयरमैन-तहरीक-ए-हुर्रियत