विधान परिषद चुनाव में हुए उलटफेर के बाद भाजपा-पीडीपी के रिश्तों में खटास बढ़ी है। कश्मीर मुद्दे के हल के लिए दोनों दलों में अलग-अलग विचार और मतभेद रहे हैं। सरकारी अफसरों के तबादलों पर भी अलग-अलग राय सामने आई है। सरकार को चलाने के लिए गठित की गई कोआर्डिनेशन कमेटी की नियमित बैठकें नहीं हो पाई हैं। हालांकि, दोनों दल सरकार के सही चलने का दावा कर रहे हैं।
एमएलसी चुनाव में पीडीपी खेमे से माने जा रहे एक निर्दलीय विधायक के भाजपा उम्मीदवार को मत देने से दोनों दलों में दरार का खतरा बढ़ गया है। श्रीनगर लोकसभा उपचुनाव में हार देखने से भी पीडीपी की चिंताएं बढ़ी हैं। कश्मीर में लगातार खराब हालात सत्ताधारी पीडीपी को परेशान किए हुए हैं।
एमएलसी चुनाव में सीट खोने से पीडीपी खेमे की यह सोच बढ़ी है कि सहयोगी भाजपा ने कैसे उसके खेमे के नुमाइंदे को अपनी तरफ खींचा। दोनों सत्ताधारी दलों में पीडीपी 29 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद केवल एक ही सीट जीत पाई और उसे अपने ही सहयोगी से हार का सामना करना पड़ा। सरकार के कई अहम फैसलों में भी भाजपा-पीडीपी में मतभेद सामने आते रहे हैं। फिलहाल दोनों दल के नुमाइंदे आपसी रजामंदी से सरकार चलाने के दावे कर रहे हैं।