रियासत में म्यांमार और बांगला देश से आए रोहिंग्या शरणार्थियों की तेजी से बढ़ती तादाद ने सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गत वर्ष तक रियासत में 13 हजार से अधिक रोहिंग्या मौजूद हैं। अनुमान है कि अब इनकी संख्या 20 हजार के पार पहुंच चुकी है।
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पाकिस्तान से इनके कथित कनेक्शन के चलते इनकी बढ़ती आबादी सुरक्षा एजेंसियों के लिए परेशानी का सबब है। रोहिंग्या के अवैध रूप से रियासत में रहने से सुरक्षा को खतरे का मामला विधानसभा में भी गूंज चुका है।
राज्य के गृह विभाग की रिपोर्ट के अनुसार जम्मू में 5086, सांबा में 634 तथा लेह-कारगिल में 7664 रोहिंग्या विभिन्न स्थानों पर रह रहे हैं। आपराधिक गतिविधियों में इनकी भूमिका की बात करें तो यहां रह रहे रोहिंग्याओं में से 10 पर पीएसए के तहत कार्रवाई की गई है। तीन पर मुकदमा चल रहा है।
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NGO से मिलती है आर्थिक मदद
NGO से मिलती है आर्थिक मदद
- फोटो : Demp Pic.
गृह विभाग की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ स्वयंसेवी संगठन तथा अन्य लोग समय-समय पर पैसे तथा अन्य तरह से इनकी मदद करते रहते हैं। इनमें श्रीनगर निवासी एक व्यक्ति द्वारा संचालित एनजीओ सखावत प्रमुख है। इस संस्था में जम्मू के भठिंडी इलाके के विधाता नगर निवासी एक व्यक्ति का भी सहयोग है।
श्रीनगर की ही संस्था एसआर इंस्टीट्यूट आफ डेवलपमेंट तथा जमात-ए-इस्लामी की ओर से भी इनकी मदद की जाती है।गृह विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि फिलहाल संगठित रूप से इनके देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने की सूचना नहीं है।
इनकी गतिविधियों पर पैनी निगाह रखी जा रही है। संबंधित थाना पुलिस को भी इस बात की हिदायत दी गई है। खुफिया सूचनाएं भी एकत्रित की जाती हैं। हालांकि, खुफिया इनपुट इस बात के भी हैं कि इनके आतंकी संगठनों से कनेक्शन हैं। ये उनके लिए मददगार का काम करते हैं।
जम्मू में बसा ली है अपनी बस्ती
बसा ली है बस्तियां
- फोटो : अमर उजाला
जम्मू जिले के भठिंडी तथा नरवाल इलाके में तो इन्होंने अपनी बस्ती ही बसा ली है। सब्जी-फल की दुकानों के साथ-साथ मछली बेचने का भी काम कर रहे हैं। खास बात यह है कि खाली सरकारी प्लाटों तथा किराये पर जमीन लेकर इन्होंने आशियाने बनाए हुए हैं। डिप्टी सीएम डा. निर्मल सिंह का कहना है कि रोहिंग्या को बसाने का फैसला पूर्ववर्ती सरकारों का है।
वर्क परमिट के तहत वे यहां आए। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीए मीर का कहना है कि यह कहना आसान है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने उन्हें बसाया। अब भाजपा-पीडीपी सरकार का इस बारे में क्या रुख है यह स्पष्ट होना चाहिए। अवैध रूप से रह रहे इन विदेशियों के सीमा पार कनेक्शन होने की भी आशंका जताई जाती रही है।
हिंदू बहुल इलाकों में इनकी मौजूदगी डेमोग्राफी में बदलाव की एक सोची समझी साजिश भी मानी जा रही है। यही वजह है कि नगरोटा सैन्य कैंप पर हमले के बाद विश्व हिंदू परिषद तथा चैंबर आफ कामर्स ने इनके खिलाफ आवाज बुलंद की है।
म्यांमार का मूल निवासी कहा जाता है रोहिंग्या समुदाय
- फोटो : डेमो फोटो
रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय मूल रूप से म्यांमार के अराकान इलाके का है। बौद्ध बहुल म्यांमार में दशकों से फौजी हुकूमत के जुल्मों से तंग आकर लाखों रोहिंग्या परिवार बांग्लादेश, भारत और सऊदी अरब सहित अनेक देशों में विस्थापित हो गए।
एक अनुमान के मुताबिक म्यांमार की छह करोड़ की आबादी में से तीन साल पहले तक 80 लाख रोहिंग्या मुस्लिम थे, लेकिन, सांप्रदायिक दंगों के कारण इनमें से 70 लाख रोहिंग्या मुसलमानों को देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। अब महज 10 लाख रोहिंग्या अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं।
म्यांमार की सैन्य सरकार का मानना है कि रोहिंग्या यहां के मूल निवासी नहीं हैं। ये लोग ब्रिटिश हुकूमत के दौरान शरणार्थी के तौर पर अराकान क्षेत्र में बसाए गए थे। अब बौद्ध कट्टरपंथी इन्हें यहां से भगाने पर आमादा हैं। 1982 में सैन्य सरकार ने कानून बनाकर इन्हें नागरिकता के अधिकार से भी वंचित कर दिया। इसके बाद भू-स्वामित्व का अधिकार छीना गया। फिर यात्रा की पूर्व सूचना देने और दो से ज्यादा बच्चे पैदा न करने का हलफनामा देने जैसे नियमों को थोपा गया।