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दो साल बाद शीतला माता के ऐतिहासिक मंदिर में उमड़े श्रद्धालु

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भद्रवाह (डोडा)। कोरोना के कारण दो साल की खामोशी के बाद डोडा जिले में रोशेरा धार में पहाड़ की चोटी पर स्थित प्राचीन शीतला माता मंदिर में महष्टमी पर सोमवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना की। इस अवसर पर कई हजार लोगों ने अपनी कुलदेवी के दर्शन किए।
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समुद्र तल से 8000 फुट की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर के आसपास का यह इलाका नागों की धरती कहलाता है। महाष्टमी का स्थानीय लोगों के लिए बेहद धार्मिक महत्व है। रोशेरा धार का 8 किलोमीटर का इलाका ग्लेशियर के कारण निर्जन रहता है। माना जाता है कि भद्रवाह शहर से 43 किमी दूर एक पहाड़ी दर्रे पर स्थित इस मंदिर की उत्पत्ति मुगल सम्राट बाबर के शासनकाल में हुई थी। नवरात्रि शरद ऋतु की शुरुआत का प्रतीक है। इस मौसम के बाद यहां कठोर सर्दियां शुरू हो जाती हैं।
अधिकारियों ने इस अवसर पर बताया कि स्थानीय कई गांवों की कुलदेवी मानी जाने वाली माता शीतला के मंदिर में पारंपरिक उत्सव की शुरुआत ऐतिहासिक मंदिर के केवार (दरवाजे) के खुलने के साथ हुई और नागाओं ने अपने प्राचीन रिवाज के अनुसार देवता को दर्जनों भेड़ों की बलि दी। सुनर्थवा पंचायत के मुख्य आयोजक एवं सरपंच राकेश चरक ने कहा, यह इस क्षेत्र का सबसे प्राचीन पर्व है. महामारी के कारण, त्योहार दो साल के लिए स्थगित कर दिया गया था। यहां रेहोशरा में अष्टमी पर देवी की पूजा किए बिना नवरात्रि अधूरी है। हम यहां फिर से आकर खुश हैं।
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एक युवा भक्त प्रतिभा राजपूत ने कहा, चार महीने की सुस्त जिंदगी (सर्दियों) से पहले यह त्योहार न केवल हमें फिर से न सिर्फ जीवंत करता है बल्कि हमें अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलने का मौका भी देता है। इसके अलावा, हमारी सभी मनोकामनाएं रेहोशरा माता द्वारा पूरी की जाती हैं। सोमवार दोपहर 12 बजे चिंता, शौरारा, नलथी, चिराला, सुनर्थवा, अटलगढ़, रैंडा और दलेन से छड़ी मुबारक (पवित्र गदा) मंदिर पहुंची, जिसके बाद भक्तों ने पारंपरिक देखू नृत्य के साथ अष्टमी मनाना शुरू कर दिया। अधिकारियों ने बताया कि चिंता गांव के स्वयंसेवकों ने श्रद्धालुओं को लंगर परोसा, जबकि प्रशासन ने उनकी सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए थे।
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आतंकियों ने जला दिया था मंदिर
शीतला माता के इस मंदिर को आतंकवाद के दौरान आतंकियों ने जला दिया था। मंदिर के साथ ही दो धर्मशालाएं भी थी। वह भी जल कर राख हो गई थी। जैसे जैसे आतंकवाद कम होता गया। वहां पर श्रद्धालुओं का जाना दोबारा शुरू हुआ। इस दौरान सुरक्षाबलों की आतंकियों के साथ पांच से छह मुठभेडे़ं भी हुई। बाद में जिला प्रशासन ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर यहां मंदिर का दोबारा निर्माण करवाया।
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