राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुडे़ जम्मू-कश्मीर स्टडी केंद्र ने जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए हैं। भगवा संगठनों और सूबे में अनुच्छेद 370 का विरोध करने वालों को लगता है कि हाईकोर्ट के इस फैसले ने उनकी बहस को मजबूत किया है।
इससे अनुच्छेद 370 को लेकर कानूनी बहस तेज होगी। संघ परिवार पहले से ही इसे कानूनी खामियों का पुलिंदा करार देता रहा है। संभावना जताई जा रही है कि मामला जल्द ही सुप्रीम कोर्ट पहुंचेगा।
जम्मू कश्मीर स्टडी केंद्र के अध्यक्ष जवाहर कौल ने कहा है कि अनुच्छेद 370 की आड़ में सूबे के अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण से महरूम रखा जा रहा है। अनुच्छेद 370 के मामले में जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट का फैसला संविधान के अनुच्छेद 16 की धारा 4अ का उल्लंघन है।
अनुच्छेद 370 की आड़ में हो रहा ये धोखा
कौल ने इंदिरा साहनी बनाम भारत गणराज्य के 1992 के फैसले का हवाला देते हुए कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 16 की धारा 4अ के तहत देश के सभी राज्यों से नौकरी में पदोन्नति में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था करने की बात कही गई है।
उन्होंने कहा कि न्यायालय के समक्ष जो याचिका दायर हुई थी, वे पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था को लेकर थी। अनुच्छेद 370 के मामले को लेकर नहीं। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 कानून के पालन को लेकर है। यह विधायी कार्यों पर रोक के लिए नहीं है।
उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संसद को यह अधिकार है कि वह कानून में बदलाव कर सकता है। उन्होंने कहा कि जब राष्ट्रपति के जरिए अनुच्छेद 16 का अनुमोदन हो गया है तो वह स्वत: ही अन्य राज्यों की तरह जम्मू-कश्मीर में लागू होगा।
अनुच्छेद 370 हमेशा के लिए है
कौल का कहना है कि अनुच्छेद 370 हमेशा के लिए है या कुछ समय के लिए यह निर्धारित करने का जिम्मा जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के परिधि में नहीं है।
दरअसल अनुच्छेद 370 को लेकर जम्मू और कश्मीर हाईकोर्ट ने 9 अक्तूबर को एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि राज्य को विशेष दर्जा देने वाले संविधान का अनुच्छेद 370 स्थायी है, इसलिए इसमें संशोधन या फिर इसे रद्द करना या हटाया जाना संभव नहीं है।
साथ ही कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 35ए राज्य में लागू मौजूदा कानूनों को संरक्षण प्रदान करता है। इसके बाद से सियासत गर्म है।