जम्मू-कश्मीर में तीस हजार से ज्यादा ऐसे केंद्र हैं, जहां पर बैठने के लिए उपयुक्त जगह नहीं है। वहीं, पढ़ाई करवाने के लिए सहायिकाओं या कार्यकर्ताओं के पद भी खाली हैं। मौजूदा समय में बच्चों को समय पर खाना खिलाने पर काम हो रहा है। बच्चों को थोड़ा बहुत ही अक्षर ज्ञान मुहैया करवाया जाता है।
नई शिक्षा नीति के तहत अभी तक आंगनबाड़ी केंद्रों में प्री-प्राइमरी स्तर की पढ़ाई शुरू नहीं हो पाई है। इसके लिए शिक्षा विभाग और सामाजिक कल्याण विभाग में समन्वय भी हुआ मगर अभी तक इसे पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है।
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कोरोना संक्रमण के कारण भी काम अटका पड़ा है। केंद्रों में प्री-प्राइमरी स्तर की शिक्षा दी जानी है। इससे बच्चों को आगे की पढ़ाई में सुविधा मिलेगी। प्री-प्राइमरी स्तर की शिक्षा के लिए केंद्रों को भी अपग्रेड किया जाना है। इस पर अभी तक काम शुरू नहीं हो पाया है।
जम्मू-कश्मीर में तीस हजार से ज्यादा ऐसे केंद्र हैं, जहां पर बैठने के लिए उपयुक्त जगह नहीं है। वहीं, पढ़ाई करवाने के लिए सहायिकाओं या कार्यकर्ताओं के पद भी खाली हैं। मौजूदा समय में बच्चों को समय पर खाना खिलाने पर काम हो रहा है। बच्चों को थोड़ा बहुत ही अक्षर ज्ञान मुहैया करवाया जाता है। सहायिकाओं की ड्यूटी खाना बनाने में होती है। इस कारण भी ज्यादा ध्यान बच्चों की पढ़ाई पर नहीं दिया जा रहा है।
आंगनबाड़ी केंद्र में तैनात सहायक के अनुसार समय की काफी कमी रहती है। इस कारण ज्यादातर समय खाना बनाने में ही बीत जाता है। अगर केंद्रों में प्री-प्राइमरी स्तर पर पढ़ाई करवानी होगी तो स्टाफ की जरूरत पड़ेगी। साथ ही अपना भवन होना चाहिए। इसमें किचन, क्लास रूम से लेकर तमाम सुविधाएं होनी चाहिएं, तभी ये प्रोजेक्ट सिरे चढ़ पाएगा। कमरे में खाना बनाना और क्लास लेना मुश्किल हो जाता है।
प्री-प्राइमरी स्तर पर शिक्षा देने पर काम तेज हो गया है। प्राथमिक स्तर पर ढांचा विकसित किया जाएगा। इसके बाद पढ़ाई करवाई जाएगी। बच्चों को दोपहर भोजन दिया जा रहा है। -टीना महाजन, निदेशक, आईसीडीएस जम्मू