जीरो ब्रिज से गुजरते ही एक अजीब सी सड़ांध से सामना होता है। पूरी फिजा बदली हुई है। चारों तरफ कचरे का ढेर और पानी में डूबकर निकला गाड़ियों का रेला। सड़क किनारे खड़ी इन गाड़ियों की बॉडी गुजरे हादसे की कहानी बयां करती हैं।
कुछ गाड़ियां पलटी हुई हैं तो कुछ आड़ी-तिरछी होकर सड़क के बीचोबीच आ गई हैं। सड़क के दोनों किनारे पानी कहीं-कहीं अब तक जमा है। वाहनों की आवाजाही अभी शुरू नहीं हो पाई है। नतीजतन अंदर के इलाकों में पैदल जाना पड़ता है।
इस सड़ांध से बीमारियां पैदा हो रही हैं। सरकार और आवाम के लिए राहत है कि इसने अभी महामारी का रूप नहीं लिया है, लेकिन हर मेडिकल कैंप पर रोजाना 300 से ज्यादा मरीज इलाज के लिए आ रहे हैं।
अल्ला जाने कहां चले गए दिल्ली हैदराबाद के पंप
राजबाग के मैन ड्रेन से पानी निकालने के लिए तीन बड़े पंप लगाए गए हैं। राजबाग के मोटर मैकनिक जहूर बताते हैं कि एक दिन पहले ही पंप लगे हैं। अगर पहले पंप लगा दिया होता तो हालात इतने नहीं बिगड़ते। चर्चा होती रही है कि हैदराबाद से बड़े पंप आए हैं।
दिल्ली और हरियाणा की पंप बनाने वाली कंपनियों ने पंप भेज दिया है लेकिन अल्लाह जाने वह सब कहां चले गए। हम लोगों को तो हादसे के इतने दिन बाद इसके दीदार हुए हैं। कान्वेंट स्कूल के पास सड़क को बीच से काटकर लगभग 15 फीट नाली बना दी गई है। इससे मोहल्लों का पानी खुद ब खुद झेलम नदी में जाने लगा है।
बांध का यह हिस्सा भी तोड़ा गया है। इस कृत्रिम नाले के ऊपर लकड़ी की एक पटरी बिछाई गई है, जिसे पैदल पार करना होता है। दूसरी ओर बिजली के ट्रांसफार्मर के नीचे खुले तारों से बचते हुए सड़क के दूसरी तरफ पहुंचा जा सकता है।
पहले आर्मी ने मदद की थी और अब
सड़क की खुदाई से मिट्टी के ढेर ने छोटे पहाड़ की शक्ल अख्तियार कर ली है। कानवेंट स्कूल के पास ही एक मेडिकल कैंप लगा है। आगे चौराहे पर तीन-चार और कैंप नजर आते हैं। टेंट में मरीजों का इलाज कर रहे डा. फिरदौस भट बताते हैं कि यहां उनके अलावा तीन और चिकित्सक हैं। रोज तीन सौ से अधिक मरीज को देखते हैं। इनमें से अधिकांश इंफेक्शन के शिकार मरीज हैं।
गले का इंफेक्शन आम है। शुक्र है खुदा का कि अब तक डिसेंट्री नहीं फैली है। कुछ पुरने मरीज डायबिटीज, थाइराइड और अन्य बीमारियों की दवा लेने आ रहे हैं। डाक्टर सविंदरजीत सिंह ने बताया कि नेशनल हेल्थ मिशन और एक एनजीओ ने मिलकर यह कैंप लगाया है। राजबाग में मुख्य सड़क से जुड़ने वाली गलियों में अब ढाई फुट पानी जमा है।
गली के दोनों किनारे वाले द्घारों के लोग अब भी नाव का सहारा लेते हैं। जहां पानी घुटने से कम हैं। वहां के बाशिंदे पैदल ही बाहर निकलते हैं। बीटा नामक संस्थान से कंप्यूटर की शिक्षा देने वाले गवार कहते हैं कि राहत कुछ भी नहीं है। पहले आर्मी ने मदद की थी और अब अल्लाह वाले ही मदद कर रहे हैं। सरकार कहीं नहीं है।