पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को अलग रखकर हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच बातचीत का सिलसिला जारी रखा जाना चाहिए।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और जनरल मुशर्रफ ने कई दौर के संपर्क में ऐसा ही फार्मूला खोजने की कोशिश की थी, जिसमें दोनों देशों की अखंडता को बरकरार रखते हुए समाधान तक पहुंचा जाए।
वाजपेयी के पास एक विजन था। वह ग्रेट स्टेटसमैन थे। मोदी साहब के पास वाजपेयी से अधिक बहुमत है। वह इस मसले का हल खोजकर इतिहास बना सकते हैं।
'कश्मीर अपने आप में एक मुल्क है'
‘अमर उजाला’ से खास बातचीत में महबूबा ने कहा कि समाधान ऐसा हो जिसमें दोनों देशों की सीमाओं को कोई मतलब नहीं रह जाए। दोनों देश हर समस्या पर संयुक्त रूप से काम करें। कश्मीर और पीओके दोनों तरफ बाढ़ आई थी।
अगर ज्वाइंट मैकेनिज्म होता तो इस कहर का और बेहतर तरीके से मुकाबला किया जा सकता था। ऐसी स्थिति कायम हो तब यह बात बेमानी हो जाएगी कि संयुक्त राष्ट्र में कौन क्या बोल रहा है। महबूबा कहती हैं कि कश्मीर अपने आप में एक छोटा मुल्क जैसा ही है। यह धर्मनिरपेक्ष है।
पाकिस्तान मुस्लिम कंट्री है, हिन्दुस्तान सेकुलर। कश्मीर भी सेकुलर है। मोदी साहब अगर कश्मीर समस्या का हल खोजते हैं तो यह इस पूरे खित्ते के लिए उनकी सबसे बड़ी देन होगी। यह समाधान पूरी दुनिया के लिए माडल बन सकता है। उन्होंने कहा कि नेहरू के सामने भी कश्मीर की समस्या चुनौती थी।
'इंदिरा भी नहीं बदल पाईं थी सूरत'
महबूबा कहती हैं कि इंदिरा जी ने शिमला समझौता किया लेकिन हालात नहीं बदले। हर पीएम कश्मीर की समस्या झेलता है। मनमोहन सिंह ने वाजपेयी की नीतियों को कुछ हद तक आगे बढ़ाया लेकिन फिर से तकरार के हालात बन रहे हैं।
वाजपेयी के समय भी संसद पर हमले के बाद हालात युद्ध जैसे बन गए थे। लेकिन दोनों देशों ने संयम से काम लिया। बातचीत से ही मसले का हल संभव है।
शरीफ का बयान बेवक्त: नईम
पीडीपी के मुख्य प्रवक्ता नईम अख्तर ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि पाक पीएम नवाज शरीफ का बयान बेवक्त आया है। अभी कश्मीर सैलाब की तबाही झेल रहा है। शरीफ ने इस आपदा पर कुछ नहीं बोला। संयुक्त राष्ट्र में भाषण से मसले का हल नहीं होगा। शरीफ को चाहिए कि कि द्विपक्षीय बातचीत के लिए प्रयास करें।