जरा सोचिए, बारूद की गंध और गोलियों की गड़गड़ाहट के बीच मौत को करीब से देखने वालों की शारीरिक और मानसिक स्थिति क्या रहती है। कई घंटों तक ऐसे हालात में रहने पर खुद में आत्मविश्वास कम होने के साथ असुरक्षा की भावना बढ़ना लाजमी है।
सीमा पार से लगातार हो रही पाक फायरिंग से सीमांत ग्रामीणों में पोस्ट ट्रामेटिक स्ट्रेस डिसआर्डर (पीटीएसडी) की आशंका काफी बढ़ जाती है। मनोचिकित्सकों के अनुसार ऐसे तनाव से पीड़ित को बाहर आने के लिए कई महीने और साल लग सकते हैं। इसमें युवा ज्यादा प्रभावित होते हैं।
साइक्रेटरी अस्पताल में कार्यरत मनोचिकित्सक डा. मनु अरोड़ा का कहना है कि सीमा पार से अचानक होने वाली फायरिंग से शारीरिक और मानसिक स्तर पर बुरा प्रभाव पड़ता है। यह वातावरण किसी जंग की तरह होता है।
सीमा पर जवान भी हो रहे है इस बीमारी के शिकार
सीमा पर लड़ाई पर जाने वाले जवानों में पीटीएसडी की समस्या पाई गई है, जिसके बाद यह शिकायत सीमांत ग्रामीणों में होती है। सामान्य रूप से चल रही दिनचर्या में अचानक सब कुछ बदलने के कारण मानसिक तनाव का स्तर कई गुणा बढ़ जाता है।
इसमें प्रभावित व्यक्ति की हैरानगी से आंख की पुतलियां सामान्य से ज्यादा खुल जाना, शरीर में तेजी से कमजोरी महसूस होना, दिल की धड़कन बढ़ना, सेना के जवानों को देखकर दिल में अंजान डर बैठ जाना, छोटी सी बात पर भी चीख उठना आदि लक्षण रहते हैं।
ऐसी परिस्थितियों में मानसिक तौर पर भारी तनाव आ जाता है, जिसमें पता नहीं चलता कि खुद कहां पर हैं और क्या हो गया। ऐसे हालात हृदय रोगियों के लिए जानलेवा भी साबित होते हैं। दिल की धड़कन तेज होने पर हार्ट अटैक की आशंका ज्यादा रहती है।
गोलियों की आवाज से कई लोगों की हो चुकी है मौत
उल्लेखनीय है कि कुछ साल पहले चिनौर जानीपुर जम्मू मुठभेड़ में एक बुजुर्ग की गोलियों की आवाज सुनकर हृदय गति रुकने से मौत हो गई थी। डा. अरोड़ा के अनुसार मुठभेड़ के बाद हालात सामान्य होने पर भी प्रभावित लोग पोस्ट ट्रामेटिक स्ट्रेस में रहते हैं।
इसका असर छह माह तक रह सकता है। इसमें बच्चों में खासकर उनका शारीरिक, मानसिक और व्यक्तिगत विकास नहीं हो पाता है। ऐसे बच्चे अकेलापन सहन नहीं कर पाते, सहमे रहेंगे, अंधेरे से डर लगना, छोटी सी आवाज यानी कोई पटाखा चलने पर भी लगेगा कि कहीं हमला हो गया है ही महसूस होता है।
ऐसी घटनाओं के बाद प्रभावित व्यक्ति की पूरी जिंदगी ही बदल जाती है। ऐसी घटनाओं के बाद कम से कम 15 दिन तक पीड़ित व्यक्ति पर एक्यूट डिप्रेशन का असर रहता है।
कैसे लें इलाज...
ऐसी घटनाओं से पीड़ित लोगों को काउंसिलिंग दी जाए। इसमें साइकोथैरेपी का भी सहारा लिया जा सकता है। इसके अलावा पारिवारिक काउंसिलिंग करवाना भी जरूरी है।
पीड़ित के सामने बीती बातों को न दोहराया जाए। उसे हर तरह से अच्छा माहौल देने की कोशिश की जाए। उन्हें मानसिक स्तर पर मजबूत बनाकर आत्मविश्वास बढ़ाया जाए।