हमारे गांव में सड़क, शिक्षा, बिजली, पानी एवं स्वास्थ्य सुविधाएं होतीं तो हमें यह दिन नहीं देखना पड़ता। यह बात सुरनकोट तहसील के गांव टोपापीर के ग्रामीणों ने कही, जहां के तीन ग्रामीणों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी, और कई ग्रामीण घायल अवस्था में अस्पताल में उपचाराधीन हैं। इसके चलतेे आठ दिनों से कोई भी ग्रामीण गांव के बाहर भी नहीं जा पाया है।
टोपापीर के ग्रामीणों एजाज अहमद, नजीर अहमद, मोहम्मद सादिक, लाल हुसैन का कहना है कि देश की आजादी के 70 साल बाद भी हमारे गांव के लिए कोई सड़क सुविधा नहीं है, गांव में एक प्राथमिक स्कूल है, बिजली के नाम पर चंद खंभे एवं तार और पानी की सप्लाई के लिए मात्र एक टैंक बना है।
गांव के बच्चों को पांचवीं कक्षा के बाद यहां से 12 किमी दूर बफलियाज जाना पड़ता है। इसके चलते गांव के चंद ही बच्चे 10वीं कक्षा से आगे पढ़ पाते हैं। देर सवेर गांव में कोई बीमार होता है तो सड़क न होने के कारण उसे कंधों पर उठाकर 12 किमी दूर पहाड़ से उतरकर बफलियाज से निजी वाहन से सुरनकोट पहुंचाना पड़ता है।
अगर हमारे गांव में भी सड़क होती एवं अन्य सुविधाएं होती तो शायद यहां ऐसे हालात नहीं होते। चारों तरफ जंगलों से घिरे होने के कारण आतंकवाद के दौर में इस तरफ से आतंकियों का खुलेआम आना-जाना होता था। अब भी क्या पता किस जंगल से आतंकी गुजरते हों। क्योंकि, आतंकवाद के दौर से ही आम लोगों ने जंगलों में लकड़ी काटने जाना बंद किया है। अब तो जंगलों में जानवरों की संख्या भी बहुत बड़ गई है जो गांव तक आ धमकते हैं।
गौरतलब है कि 30 वर्षों से अधिक समय से जारी आतंकवाद के दौर से ही अविकसित एवं सुविधाओं से वंचित क्षेत्र आतंकियों के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। जिले में ऐसे ही क्षेत्र आतंकियों का गढ़ रहे हैं।
आतंकवाद के शुरू में सड़क से दूर मढा, कुलाली, दोफल्ली, मरहोट, इलीयां, सोलियां, डोडी, हिलकाका, हाडीबुड्डा, मुगलमाडा के साथ ही हिलकाका जैसे क्षेत्रों में आतंकियों ने बरसों तक डेरा जमाए रखा और हिलकाका को आतंकियों से मुक्त कराने के लिए सेना को ऑपरेशन सर्पविनाश चलाना पड़ा था, जिसमें जमीन के साथ हेलिकॉप्टरों का उपयोग करते हुए सौ से अधिक आतंकियों को मार गिराया गया था।
आतंकयों के सफाए के साथ ही उन क्षेत्रों में सेना एवं प्रशासन की तरफ से विकास करवाने एवं सुविधाओं का विस्तार करने का काम किया गया। उधर, डीडीसी सदस्य सुरनकोट सुहेल मलिक का भी कहना है कि अगर टोपापीर जैसे क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाएं होती तो यहां पर जो समस्याएं आज सामने आ रही हैं, वह नहीं आती।