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राज्यपाल शासन के बावजूद सियासी हलचल जारी

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जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू होने के बावजूद सियासी हलचल जारी है। पार्टियां रणनीति बनाने में जुटी हैं। राज्यपाल शासन लागू होने से सियासी लाभ-हानि को भी आंका जा रहा है। बहरहाल इन सबके बावजूद सबकी नजरें भाजपा, पीडीपी के अगले कदम पर टिकी हुई हैं। कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस भी मैदान में बने रहने की कवायद में जुटे हैं।
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पार्टी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पीडीपी चाहती है कि राज्यपाल शासन लागू होने से लोकतांत्रिक सरकार के गठन की जमीन तैयार हो। इसके लिए कश्मीर संभाग के लोगों को गठबंधन पर विश्वास में लेने में भी मदद मिलेगी और अगर भाजपा के साथ गठबंधन होता है, तो इससे कश्मीर में सियासी हानि नहीं होगी।   

उधर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष प्रो. सैफुद्दीन सोज की ओर से प्रेस बयान जारी कर कहा गया है कि उमर अब्दुल्ला की ओर से कार्यवाहक मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफे की पेशकश की सूचना मिलने के बाद उन्होंने उमर से आग्रह किया था कि वह ऐसा न करें।
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राज्य में पैदा हो सकता है संवैधान‌िक संकट

उमर के इस्तीफे देने से संवैधानिक संकट पैदा होगा और रियासत के लोगों को परेशानी होगी। इस्तीफा देने के बजाय वह कुछ दिन इंतजार करते तो बेहतर होता। राज्यपाल शासन से अच्छा होता कि पीडीपी के निर्वाचित नेता को सरकार बनाने के लिए न्योता दिया जाता।

बदकिस्मती से पीडीपी ने सरकार बनाने के लिए अकेले भाजपा से बात की, जबकि कांग्रेस और चार निर्दलीय विधायकों ने पीडीपी को पूर्ण समर्थन दिया था। राज्यपाल शासन के बाद भाजपा के नेताओं में भी चर्चाओं का दौर जारी है। ऐसा ही हाल नेशनल कांफ्रेंस का भी है।

सियासी गलियारों में हो रही चर्चाओं के अनुसार राज्यपाल शासन के बावजूद पीडीपी और भाजपा के अगले कदम का इंतजार है। चर्चाओं के अनुसार भाजपा और पीडीपी को गठबंधन में देर सवेर सरकार बनाना ही है। अस्थायी तौर पर लागू किया गया राज्यपाल शासन केवल उसके लिए जमीन तैयार करने की दिशा में कदम है।
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