- महबूबा की बेटी, उमर के बेटों, राणा की बेटी के बाद अब कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष का बेटा राजनीति में सक्रिय
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू-कश्मीर की राजनीति में वंशवाद की सियासत का सिलसिला जारी है। राजनीतिक दलों के दिग्गज नेताओं के बच्चे सियासी विरासत बचाने के लिए मैदान में उतर रहे हैं।
युवा पीढ़ी के राजनीति में सक्रिय होने का सिलसिला जेल में बंद सांसद इंजीनियर रशीद के 22 वर्षीय बेटे अबरार से शुरू हुआ था, जिन्होंने अपने पिता के लिए लोकसभा चुनाव में प्रचार किया और जीत दर्ज की। इस क्रम में पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती की बेटी इल्जिता मुफ्ती, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के बेटे जहीर और जमीर अब्दुल्ला, नगरोटा के भाजपा विधायक दिवंगत देंवेद्र राणा की बेटी दिव्याणी राणा के बाद अब कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष तारिक हमीद कर्रा के बेटे वलीद तारिक का नाम भी शामिल हो चुका है। चर्चा यह है कि उमर अब्दुल्ला बडगाम विधानसभा सीट पर उपचुनाव में बड़े बेटे को मैदान में उतार सकते हैं। नगरोटा विधानसभा सीट से देवेंद्र राणा की बेटी दिव्याणी के चुनाव लड़ने की भी चर्चा है। इससे साफ है कि आगामी चुनावों में नेताओं की युवा पीढ़ी राजनीतिक विरासत संभालती नजर आएगी। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की बेटी इल्तिजा का नाम इनमें सबसे ऊपर है। हालांकि वह विधानसभा चुनाव हार गईं।
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हर दल में है वंशवाद
अकसर सुनते हैं कि वंशवाद की राजनीति हो रही है। सियासी दल आपस में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप भी लगाते हैं। लेकिन ऐसा कौन नहीं करता। हर दल में ऐसा है। रही बात युवा पीढ़ी की, तो इसके लिए चुनावी प्रक्रिया से गुजरना है। युवा पीढ़ी को लोगों का विश्वास जीतना होगा। तभी वे अपनी राजनीतिक विरासत संभाल सकते हैं। कई बड़े नेताओं के बच्चे चुनाव में हार जाते हैं। लिहाजा राजनीति में उतरने पर सीधे चुनाव लड़ने की जगह पहले लोगों के बीच जाना होगा।
- एलोरा पुरी, सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर, जम्मू विवि
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मां-बाप सिर्फ राजनीति में
लाएंगे, जगह खुद बनानी होगी
यदि कोई लोकतंत्र में सफल है तो उनको अपने बच्चों को राजनीति में लाना ही चाहिए। बच्चों को भी अधिकार है, वे इसे संभालें। इसके लिए सिर्फ मां-बाप का नाम ही काफी नहीं। हम लोकतंत्र में हैं। इसकी एक प्रक्रिया है, जो सीधी आम जनता से जुड़ी है। इसमें चुनाव लड़ना होगा और जीतना होगा। जीत के लिए आम लोगों का भरोसा जीतना पड़ेगा। मां-बाप का काम राजनीति में लाना है। युवा पीढ़ी राजनीतिक में जरूर आए, लेकिन मां-बाप के सहारे न रहे। खुद को आम लोगों के बीच साबित करना पड़ेगा।
- जफर चौधरी, वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार एवं विश्लेषक