देश की शीर्ष खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के पूर्व प्रमुख एएस दुलत की किताब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिले जनादेश और अवसरों का विस्तार से जिक्र करते हुए इस पर पूरा एक अध्याय है।
दुलत का स्पष्ट मानना है कि मोदी के पास जम्मू-कश्मीर को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह से अधिक आजादी और अवसर हैं।
हालांकि, उनका यह भी कहना है कि पंडित नेहरू के बाद वाजपेयी इस देश के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री रहे। वाजपेयी नेहरूवाद के पक्षधर थे और पीएम मोदी की नीतियां वाजपेयी की नीतियों से काफी अलग है।
वाजपेयी का कार्यकाल सबसे कठिन था
अमर उजाला से खास बातचीत में दुलत ने कहा कि मनमोहन सिंह कश्मीर के मुद्दे पर बहुत कुछ करना चाहते थे, लेकिन, कांग्रेस के अंदर और सरकार में सहयोगियों का समर्थन न मिलने के कारण वह बहुत कुछ नहीं कर पाए।
मनमोहन सिंह शुरू में तो ठीक तरीके से आगे बढ़े लेकिन बाद में रास्ता भटक गए। वहीं, गठबंधन सरकार होने के बावजूद वाजपेयी काफी आगे बढ़े। तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी धड़े हुर्रियत से बातचीत के लिए उन्हें जम्मू-कश्मीर भेजा और सरकार ने भी दो बार हुर्रियत से बात की।
पाकिस्तान से रिश्तों के मामले में भी वाजपेयी दो कठिन चुनौतियों से गुजरे। पहला कारगिल संघर्ष और दूसरा संसद पर हमला। इसके बावजूद वह पूरे कार्यकाल में लगातार पाकिस्तान को लेकर संवेदनशील रहे और अंत तक कोशिश जारी रखी।
दक्षेस शिखर सम्मेलन में भी इस्लामाबाद गए। उन्होंने काफी हद तक देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की नीतियों का अनुसरण किया।
मोदी की कश्मीर में चल रही नीति ठीक नहीं
दुलत कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी कश्मीर में स्टेट्स-को की नीति पर चल रहे हैं। वहां पाकिस्तान कौन कहे, इराक के आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के झंडे लहराए जा रहे हैं।
दुलत के अनुसार कश्मीर समस्या का समाधान स्टेट्स-को की रणनीति से नहीं किया जा सकता। कश्मीर में स्टेट्स-को नहीं चलता। इसी तरह से भारत पाकिस्तान को दरकिनार करके दक्षेस देशों का नेतृत्व भी नहीं कर सकता।
क्योंकि दक्षेस में जहां भारत पहले नंबर का देश है तो पाकिस्तान दूसरे नंबर का। इतना ही नहीं दोनों देश के बीच द्विपक्षीय वार्ता और सहमति ही किसी समस्या का अंतिम उपाय है।
सीएमजी या पंजाब में एक गिल होता तो कंधार नहीं जा पाता विमान
दुलत ने इंडियन एयर लाइंस के विमान अपहरण पर मचे घमासान में फिर माना, तकनीकी रूप से गलती हुई थी। भारत ने एक मौका गंवाया था। उनका कहना है कि उस वक्त हिम्मत और तरकीब दोनों की जरूरत थी।
लेकिन दुर्भाग्य से पंजाब पुलिस में या केंद्र सरकार के क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप में कोई केपीएस गिल (पंजाब के पूर्व डीजी) जैसा व्यक्ति नहीं था। उनका मानना है कि गिल जैसा कोई होता तो विमान अमृतसर से आगे नहीं बढ़ पाता।
उन्होंने कहा कि अपहरणकर्ताओं के चंगुल से विमान को छुड़ाने के लिए 105 आतंकियों को छोड़ने की सौदेबाजी 35, 15 और अंत में तीन पर आकर खत्म हुई। इसकी भारत को कीमत चुकानी पड़ी।