जम्मू कश्मीर विधानसभा के नतीजों ने स्थापित सियासी समीकरणों को उलटपुलट दिया है। संख्याबल में पीडीपी से पिछड़ने के बावजूद भाजपा ने मिशन को पूरा करने का अभियान जारी रखने का फैसला लिया है। इस सियासी जंग में एक ओर राष्ट्रीय दलों भाजपा और कांग्रेस की रस्साकसी है तो दूसरी ओर क्षत्रपों की पारंपरिक प्रतिद्वंदिता नए समीकरणों की पृष्ठभूमि तैयार कर रही है।
कांग्रेस के प्रचार अभियान प्रमुख और राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने महाराष्ट्र में शरद पवार की भूमिका का अनुसरण करते हुए पीडीपी के लिए समर्थन की पहल की तो मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने उस पर ब्रेक लगा दिया। अब उमर भाजपा के साथ समीकरणों की नई संभावनाओं की तलाश में जुट गए हैं।
दरअसल नेकां किसी भी हालत में पीडीपी को रोकना चाहती है और कांग्रेस ने भाजपा के विजय रथ को रोकने का समानान्तर प्रयास शुरू किया है। उधर भाजपा ने सरकार बनाने के लिए महासचिव राम माधव को कश्मीरी नेताओं से संपर्क का जिम्मा सौंपा है। संसदीय दल की बैठक के बाद राम माधव श्रीनगर आ सकते हैं।
क्या मोदी और मुफ्ती मोहम्मद सईद की मुलाकात ?
नतीजों से साफ है कि जनादेश कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के खिलाफ है। नेकां और कांग्रेस की गठबंधन सरकार के खिलाफ मतदाताओं ने जम्मू में भाजपा को और कश्मीर में पीडीपी को जनादेश दिया है। इस खंडित जनादेश के छिपे संदेश को पढ़ें तो यह पीडीपी और भाजपा की सरकार की ओर इशारा करता है।
पीडीपी के मुख्य प्रवक्ता नईम अख्तर ने इसके इसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुफ्ती मोहम्मद सईद की मुलाकात का प्रस्ताव भी रखा है। लेकिन इस दोस्ती का राह में कई कांटे हैं। पीडीपी के सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री मुजफ्फर हुसैन बेग कांग्रेस से गठबंधन के पक्ष में हैं। वह कांग्रेस को स्वाभाविक दोस्त मानते हुए न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर सरकार के गठन के पक्ष में हैं।
पीडीपी और भाजपा के गठबंधन की राह में दूसरी बड़ी बाधा हिन्दू सीएम बनाने का प्रयास की है। भाजपा आलाकमान ने जम्मू के सीएम पर हमेशा जोर दिया है।
पीडीपी और भाजपा के गठबंधन में पेंच फंसा
सबसे बड़े दल के रूप में उभरी पीडीपी अपने नेता मुफ्ती मोहम्मद के अलावा मुख्यमंत्री के रूप में किसी और को स्वीकार नहीं करेगी। ऐसे में भाजपा का सीएम संभव नहीं है। लिहाजा पीडीपी और भाजपा के गठबंधन में पेंच फंसा है। भाजपा और पीडीपी में दोस्ती का आधार सत्ता के बंटवारे का फार्मूला बन सकता है। इसके तहत दोनों दल तीन-तीन साल तक सत्ता बांट सकते हैं।
पीडीपी ने 2002 में ऐसा ही समझौता कांग्रेस के साथ किया था जिसके तहत पहले तीन साल में मुफ्ती और बाद में कांग्रेस के आजाद सीएम बने थे। वैसे अगर भाजपा नेकां को समर्थन के लिए तैयार कर पाती है तो उसके लिए सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या बल जुटा लेना आसान हो जाएगा।
भाजपा सूत्रों की मानें तो सरकार बनाने के लिए फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला से संपर्क जारी है। भाजपा की पहली कोशिश अपने नेतृत्व में सरकार बनाने की है और इसके लिए परदे के पीछे बातचीत का दौर शुरू हो चुका है।