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Jammu News: पहले होती थी श्रद्धा, अब रह गया मनोरंजन

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कुगु राम
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बुजुर्गों ने बताया कैसे बदल गया उत्तर भारत का सबसे बड़ा झिडी मेला
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परगवाल। भारत पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बसे गांवों के बुजुर्गों ने पुरानी यादें साझा कीं। उनका कहना है कि पहले जब मेला लगता था तो गांव-गांव में उत्साह की लहर थी। परिवार कई दिन पहले से तैयारी में जुट जाते थे। कपड़े सिलवाना, बैलगाड़ी सजाना और घर-आंगन की सफाई करने में खूब रौनक रहती थी।
बुजुर्गों का कहना है कि उस दौर में मेले का मतलब सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि श्रद्धा, भक्ति और आपसी मेलजोल का प्रतीक हुआ करता था। लोग दूर-दूर से पैदल या बैलगाड़ी से मेला देखने आते थे। सबसे पहले मंदिर में पंहुचकर माथा टेकते थे। एक दो दिन वहीं रुकते थे। वहीं अब समय के साथ मेले का स्वरूप बदल गया है।
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अब लोग बस घूमने-फिरने और सेल्फी लेने के लिए आते हैं। पहले तो मेले में पहुंचना अपने आप में एक त्योहार होता था। बुजुर्ग ध्याना राम ने कहा कि पहले मेले में लोकगीत, झूले और धार्मिक आयोजन होते थे। आजकल तो ये सब मनोरंजन और व्यापार का केंद्र बन गया है। हालांकि युवाओं के लिए मेला अब भी उत्साह और उमंग का प्रतीक है लेकिन बुजुर्गों की नजर में उसमें वह आत्मीयता और लोक संस्कृति की झलक अब कम हो गई है।
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बुजुर्ग कुगु राम ने बताया कि पहले के मेले समाज को जोड़ने का माध्यम थे। परिवार, रिश्तेदार और दोस्त वहीं मिलते थे, लेकिन अब भीड़ तो बढ़ी है, पर अपनापन घट गया है।

कुगु राम

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