सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित, आंदोलन की चेतावनी
संवाद न्यूज एजेंसी
सांबा। वर्ष 1947, 1965 और 1971 में भारत–पाकिस्तान युद्धों के दौरान विस्थापित हुए जिले के परिवार आज भी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। युद्ध के समय अपनी जमीन-जायदाद और घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचे इन परिवारों को सरकार ने बसाने के लिए भूमि तो अलॉट की थी लेकिन दशकों बाद भी उन्हें उस भूमि का पूर्ण मालिकाना हक नहीं दिया गया है। इसे लेकर विस्थापित परिवारों में रोष है। चेतावनी दी कि हक के लिए उन्हें आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा।
विस्थापित परिवारों को जो जमीन अलाॅट की गई है वह अधिकतर सरकारी या कस्टोडियन भूमि के रूप में दर्ज है। मालिकाना हक न मिलने से वे न तो उस जमीन पर बैंक से ऋण ले पा रहे हैं और न ही कई सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ उठा पा रहे हैं।
दर्शन चौधरी, पूर्व सरपंच, प्लूरा
-प्रधानमंत्री आवास योजना, किसान सम्मान निधि और अन्य भूमि आधारित योजनाओं में भी उन्हें तकनीकी अड़चनों का सामना करना पड़ता है। कई बार प्रशासन को ज्ञापन देने और जनप्रतिनिधियों से मिलने के बावजूद अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
रीना चौधरी, पूर्व सरंपच, पंगदौर
भारत-पाकिस्तान के मध्य तीन युद्धों की पीड़ा झेलने के बाद भी यदि विस्थापितों को बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़े तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार से मांग की है कि जल्द उन्हें अलॉट की गई भूमि का स्थायी मालिकाना हक दिया जाए ताकि वे सम्मानपूर्वक जीवन यापन कर सकें और सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ ले सकें।
यशपाल शर्मा, राजपुरा
-
विस्थापित परिवारों को अलाॅट भूमि के मालिकाना अधिकार दिए जाने के लिए विधानसभा में भी मुद्दा उठाया है। जम्मू-कश्मीर सरकार से कहा है कि विस्थापित परिवारों को अलाॅट भूमि का मलिकाना अधिकार दिया जाए।
डॉ. देवेंदर मन्याल, विधायक, रामगढ़ विधानसभा क्षेत्र
सचिवालय से अभी तक हमारे पास कोई गाइड लाइन नहीं आई है। इस कारण कार्य नहीं हो पा रहा। जैसे ही गाइड लाइन आती है तो भूमि के मालिकाना अधिकार संबंधी काम शुरू हो जाएगा।
- करणजीत सिंह, तहसीलदार, राजपुरा