नादिमर्ग में आयोजित शोक सभा के लिए रखी गई पूजन सामग्री।
- फोटो : संवाद
आज भी सोच कर रूह कांप उठती है :
भावना भट ने कहा कि आज भी नरसंहार के बारे में सोच कर रूह कांप उठती है। हमारे भाई-बहनों के साथ उस भयानक रात को क्या हुआ होगा। उन पर क्या गुजरी होगी। स्थानीय कश्मीरी मुस्लिम शाइक अहमद मलिक ने कहा, हम इस दिन का जितना अफसोस करेंगे वो कम है। उस रात जो घटा हमारे माथे पर एक कलंक समान है जिसे हम कभी धो नहीं सकते। पैगम्बर मोहम्मद साहब भी फरमाते हैं जिसने एक बेगुनाह का कत्ल किया उसने इंसानियत का कत्ल किया है। उस रात तो 24 लोगों की हत्या कर दी गई। 23 मार्च, 2003 की रात को आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने नादिमर्ग गांव पर हमला बोल दिया था। कश्मीरी पंडितों के परिवारों को उनके घरों से बाहर घसीटा, उन्हें एक चिनार के पेड़ के पास कतार में खड़ा करने के बाद गोलियों से भून दिया।
इस क्रूर हमले ने इस क्षेत्र की सामूहिक यादों पर एक ऐसा गहरा जख्म छोड़ा है जिसे मिटाया नहीं जा सकता। सांप्रदायिक सौहार्द को दर्शाते हुए इस भावुक पल में स्थानीय मुस्लिम कश्मीरी पंडितों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए। प्रार्थनाएं करते समय वे एक-दूसरे के साथ आंसू बांट रहे थे और एक-दूसरे को गले लगा रहे थे। ये दृश्य आतंकवाद को एक करारा जवाब था।