पढ़ाई के साल नहीं, सीख को बनाया गया पैमाना
यह अध्ययन वर्ष 2011-12, 2017-18 और 2021-22 के आंकड़ों पर आधारित है। इस रिसर्च की खास बात यह है कि इसमें शिक्षा का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया गया कि बच्चे कितने साल स्कूल गए, बल्कि यह भी देखा गया कि कक्षा 8 तक पहुंचने के बाद वे वास्तव में कितना सीख पाए। इसके लिए रिपोर्ट में शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक का इस्तेमाल किया गया है।इसका सीधा मतलब यह है कि बच्चा स्कूल में बैठकर वास्तव में क्या सीख रहा है। इसे तय करने के लिए कक्षा 8 के बच्चों की दो बुनियादी क्षमताओं को आधार बनाया गया। पहली, क्या बच्चा शुरुआती कक्षा का साधारण पाठ सही ढंग से पढ़ सकता है। दूसरी, क्या वह भाग जैसे बुनियादी गणित के सवाल हल कर सकता है। इन मानकों के आधार पर बच्चों की वास्तविक सीख का आकलन किया गया।
सूचकांक में साफ गिरावट, सीख पीछे रह गई
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021-22 में जम्मू-कश्मीर का परंपरागत शिक्षा सूचकांक लगभग 0.6 रहा, लेकिन जब इसमें सीख की गुणवत्ता को जोड़ा गया तो यह घटकर करीब 0.48 पर आ गया। इसी तरह वर्ष 2017-18 में यह सूचकांक लगभग 0.55 से घटकर करीब 0.41 रह गया, जबकि वर्ष 2011-12 में यह लगभग 0.53 से घटकर करीब 0.38 पर आ गया। इन आंकड़ों से साफ संकेत मिलता है कि पढ़ाई के साल पूरे होने के बावजूद बच्चों की सीख उस रफ्तार से आगे नहीं बढ़ पाई, जैसी उम्मीद की जाती है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि कक्षा 8 तक पहुंचने के बाद भी बड़ी संख्या में बच्चे न तो अपेक्षित स्तर पर पाठ पढ़ पा रहे हैं और न ही बुनियादी गणित में सहज हैं।
नीति और नतीजों के बीच बढ़ता फासला
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति नीतियों और जमीन पर दिख रहे नतीजों के बीच बढ़ते फासले की ओर इशारा करती है। जम्मू विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग में प्रोफेसर सुशांत पांडा के अनुसार पहाड़ी और दूरदराज इलाकों में शिक्षकों की कमी, नियमित निगरानी का अभाव और बुनियादी कक्षाओं पर अपेक्षित ध्यान न मिलना इस समस्या को और गंभीर बना देता है। वहीं जम्मू विश्वविद्यालय से जुड़े शिक्षाविद राजीव शर्मा का कहना है कि शिक्षा सुधार का अगला चरण अब संख्या पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता पर केंद्रित होना चाहिए। उनके अनुसार प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर बच्चों की बुनियादी पढ़ाई मजबूत किए बिना शिक्षा के बेहतर नतीजे हासिल करना मुश्किल होगा।
रिपोर्ट ने दिया साफ संदेश
रिसर्च का निष्कर्ष स्पष्ट है कि स्कूल खोलना, नामांकन बढ़ाना और पढ़ाई के साल पूरे कराना जरूरी तो है, लेकिन यही शिक्षा की सफलता की पूरी तस्वीर नहीं है। असली कसौटी यह है कि बच्चा कक्षा में बैठकर क्या सीख रहा है। जब तक बुनियादी पढ़ना और गणित मजबूत नहीं होंगे, तब तक शिक्षा के बेहतर नतीजों की उम्मीद करना मुश्किल रहेगा।