पाकिस्तान से वार्ता की मांग का विरोध करने वालों पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला जमकर बरसे। उन्होंने पाकिस्तानी राजदूत के साथ अलगाववादी नेताओं की मुलाकात के हवाले से कहा कि चाय के कप की वजह से बातचीत बंद करना उचित नहीं है।
क्योंकि यह सिलसिला बीस साल से चल रहा है। संसद पर और मुंबई में आतंकी हमलों के बाद भी पाकिस्तान से बातचीत हुई थी। उमर विधानसभा के आखिरी सत्र के समापन पर सदन को संबोधित कर रहे थे।
रियासत के हर दल ने दी है कुर्बानी
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने स्पष्ट किया कि राज्य विधानसभा में बैठा कोई भी सदस्य देश से खिलवाड़ नहीं कर सकता। हममें से कोई भी देश विरोधी नहीं क्योंकि विधानसभा के हर सदस्य ने देश के नाम पर ही शपथ ग्रहण की है।
लिहाजा हमारी विचारधारा का फैसला टेलीविजन स्टूडियो में बैठा कोई शख्स नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि इस सदन में बैठा कौन ऐसा होगा जिसे खतरा नहीं है। राज्य विधानसभा पर जब हमला हुआ था तो तीस लोग मारे गए थे।
जम्मू कश्मीर में कौन सा ऐसा सियासी दल नहीं है जिसने कुर्बानी नहीं दी। नेशनल कान्फ्रेंस के ही आठ हजार कार्यकर्ता आतंकवाद में मारे गए। इसके बावजूद हमें देश विरोधी कहा जाना अफसोसजनक है।
'आतंकी हमले के बाद भी नहीं रुकी थी बात'
उमर ने कहा कि राज्य विधान परिषद में पाकिस्तान से वार्ता की मांग पर प्रस्ताव परित करने पर हल्ला किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब संसद पर हमला हुआ था तो उस समय केंद्र सरकार में मंत्री थे।
तब भारत की तरफ से बीस लोगों की सूची तैयार पाकिस्तान से इन लोगों को सौंपने की मांग की गई थी। उन्होंने कहा कि हमें देश विरोधी बताने वाले बताएं कि कहां है वह बीस लोग, लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान से बातचीत हुई। मुंबई में आतंकी हमले के बाद ही पाकिस्तान से बातचीत हुई।
मुख्यमंत्री ने कहा कि क्या अब हम जंग की बात करें तो हमें राष्ट्रवादी करार दिया जाएगा। अमन और वार्ता की बात करने पर हमें देश विरोधी बताया जा रहा है। अगर हम देश विरोधी होते तो जम्मू कश्मीर में बात करने वाला कोई नहीं होता। 1990 से 1996 के हालात इसका गवाह हैं।