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जम्मू-कश्मीर: सियासत ने दिखाए कई रंग, लोस चुनाव हारने के 131वें दिन उमर को दिलाया सत्ता का संग

Thu, 17 Oct 2024 01:15 PM IST
विजय पुंडीर राहुल दुबे, अमर उजाला, जम्मू

सार

पिछला एक दशक प्रदेश की सियासत में बड़े बदलाव लेकर आया। इन बदलावों ने उमर अब्दुल्ला को तमाम रंग दिखाए। एक दशक पहले उमर अब्दुल्ला सत्ता से बाहर हुए। पीडीपी कुछ साल सत्ता में रही। एलजी शासन लागू रहा, अनुच्छेद 370 हटा। राजनीतिक अस्थिरताएं राज्य की सियासत में भी थीं, तो उमर के निजी जीवन में भी।
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नेकां उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला - फोटो : संवाद
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विस्तार
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जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के लिए बीते 130 दिन उथल-पुथल भरे रहे। इस दौर में उन्होंने बारामुला सीट से लोकसभा चुनाव हारा। इसके बाद विधानसभा चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। नामांकन शुरू होने से ठीक पहले चुनाव लड़ने का फैसला लिया वो भी दो-दो सीटों (बडगाम और गांदरबल) से। दोनों सीटों पर चुनाव जीता और पार्टी सत्ता में काबिज हो गई। लोकसभा चुनाव में हारने के ठीक 131वें दिन केंद्र शासित प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली।

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पिछला एक दशक प्रदेश की सियासत में बड़े बदलाव लेकर आया। इन बदलावों ने उमर अब्दुल्ला को तमाम रंग दिखाए। एक दशक पहले उमर अब्दुल्ला सत्ता से बाहर हुए। पीडीपी कुछ साल सत्ता में रही। एलजी शासन लागू रहा, अनुच्छेद 370 हटा। राजनीतिक अस्थिरताएं राज्य की सियासत में भी थीं, तो उमर के निजी जीवन में भी। उमर के वैवाहिक जीवन में भी उथल-पुथल आई। 1994 में उमर ने पायल नाथ से शादी की। 2011 में उन्होंने तलाक के लिए अर्जी दे दी। उमर ने 2011 में सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि वह और उनकी पत्नी अलग हो रहे हैं।

लोकसभा में हार के बाद पार्टी की साख बचाना, कश्मीरियों के बीच पार्टी का झंडा बुलंद करना उमर अब्दुल्ला के सामने बड़ी चुनौती थी। इसके लिए उन्होंने जनता से संवाद स्थापित किया। कश्मीर के मुद्दों पर मुखर होकर बोले। अनुच्छेद 370 की बहाली और पूर्ण राज्य के दर्जे के मुद्दे को ही प्राथमिकता में रखा। पूरा चुनाव इसी पर लड़ा और शुरू से ही पूरा फोकस कश्मीर संभाग में रखा। सीटों के दौरों से लेकर टिकट फाइनल करने तक के सारे समीकरण बिठाए। कांग्रेस के साथ गठबंधन होगा इसकी भनक तक किसी को नहीं लगने दी। वरिष्ठ पत्रकार जफर इकबाल कहते हैं कि भले ही उमर ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था, लेकिन पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं का ही दबाव था कि वह चुनाव लड़ें। उनके चुनाव लड़ने की घोषणा ने ही पार्टी के लिए कश्मीर संभाग में संजीवनी का काम किया।

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संवाद ही एकमात्र रास्ता, जिसने फिर अर्श पर पहुंचाया
वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 और 35 (ए) हटाया गया, तो उमर अब्दुल्ला ने राज्य में अलग-अलग जगहों पर जाना, लोगों से मिलना जारी रखा। केंद्र सरकार के खिलाफ जनता में स्पष्ट संदेश दिया। इसी बीच अलगाववादी नेताओं के खिलाफ भी मोर्चा खोला। लोगों को यह समझाने में कामयाब हुए कि इनके चुनाव जीतने से कश्मीरियों के मसले हल नहीं होंगे। लोकसभा 2024 के चुनाव में बारामुला की 18 विधानसभा में 15 सीटों पर इंजीनियर रशीद को लीड दिलाने वाली जनता ने उस लोकसभा क्षेत्र की16 सीटें नेकां की झोली में डालीं। राजनीतिक विशेषज्ञ मोहम्मद ताजुद्दीन कहते हैं कि उमर अब्दुल्ला लोकसभा में हारने के बाद भी कश्मीरी मुद्दों को पकड़े रहे। जमीनी स्तर पर काम करते रहे और जनता से सीधा संवाद बनाए रखने का ही नतीजा था कि वह दोबारा सत्ता में काबिज हो सके।

ये होंगी चुनौतियां... एलजी से न हो टकराव, पैदा हों रोजगार
उमर अब्दुल्ला के दूसरे मुख्यमंत्री काल में जम्मू-कश्मीर का सांविधानिक ढांचा पूरी तरह से बदल चुका है। इसमें राज्य के फैसले मुख्यमंत्री कार्यालय के अलावा राजभवन से भी होंगे। ऐसे में उमर अब्दुल्ला के सामने ये बड़ी चुनौती होगी कि वह एलजी से समन्वय बनाकर रखें। राज्य का विकास भी चलता रहे और रोजगार भी मिले, ये भी चुनौती रहेगा। एक नौकरशाह बताते हैं कि अब पुलिस में सीधी भर्तियां जम्मू-कश्मीर लोक सेवा आयोग करेगा। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर सिलेक्शन बोर्ड के पास सभी पीएसयू, सरकारी कंपनियों, निगमों और बोर्ड में सर्विसेस और नॉन-गजेटेड पदों के साथ-साथ क्लास-4 की भर्तियां करने का अधिकार भी होगा। यह साफ है कि अब चुनी हुई सरकार क्लास-4 श्रेणी में भी भर्ती नहीं कर सकेगी। अब असल परीक्षा उमर अब्दुल्ला की इसलिए भी होगी क्योंकि राज्य का दर्जा बहाल करवाने से लेकर किए वादों का पूरा करने का दबाव रहेगा।

वर्ष 2014 के चुनाव के बाद ऐसी थी राज्य की राजनीतिक तस्वीर
  • 87 में पीडीपी ने 28 सीटें हासिल की। भाजपा 25, नेकां ने 15 और कांग्रेस ने 12 सीटें पाईं
  • भाजपा-पीडीपी ने मिलकर सरकार बनाई और मुफ्ती मोहम्मद सईद सीएम बने। जनवरी 2016 में मुफ्ती मोहम्मद सईद का निधन हो गया। बाद में उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती मुख्यमंत्री बनीं।
  • महबूबा के सीएम बनने के करीब दो साल बाद 19 जून 2018 को गठबंधन टूट गया।
  • इसके बाद राज्यपाल और फिर एलजी शासन लागू हो गया। सितंबर 2024 में 10 साल बाद फिर चुनाव हुए।
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