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विश्व प्रसिद्ध बासमती के कब आएंगे अच्छे दिन

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विश्व प्रसिद्ध बासमती की लागत का खर्च भी किसान वसूल नहीं पा रहे। अब तक बासमती का समर्थन मूल्य ही तय नहीं किया गया है। इसकी वजह से किसानों की बासमती कौड़ियों के भाव बिकती है।
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जब कभी बासमती की विदेश में मांग तेज हो तो कुछ दाम अच्छे मिल जाते हैं। अन्यथा मिलरों और शैलरों के बनाए दामों पर बासमती बेचनी पड़ती है। अब फिर से बामसती तैयार होने को है।

एक बार फिर किसानों की बासमती का समर्थन मूल्य तय करने की मांग जोर पकड़ गई है। हर किसान की जुबान पर यही सवाल है कि आखिर उनके अच्छे दिन कब आएंगे।
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किसानों ने समर्थन मूल्य तय करने की मांग उठाई

बासमती ग्रोवर्स एसोसिएशन के प्रधान चौधरी देव राज का कहना है कि प्रति कनाल बासमती का खर्च तीन हजार से 3500 रुपये के बीच है, जबकि प्रति कनाल पर डेढ़ क्विंटल बासमती निकलती है, यह भी अच्छी परिस्थितियों में।

अमूमन एक क्विंटल तक ही पैदावार होती है। किसानों को एक क्विंटल बासमती पर 2000 से 2500 रुपये मिलते हैं। कभी-कभी तो दाम 1500 से 1800 तक मिलते हैं। ऐसे में किसानों के लिए बासमती लगाना महंगा हो रहा है।

सरकार को चाहिए कि बासमती का समर्थन मूल्य 3500 से 4000 रुपये प्रति क्विंटल तय हो। जब मिलर को पता होगा कि समर्थन मूल्य चार हजार है तो दाम मार्केट के हिसाब से पांच से छह हजार रुपए प्रति क्विंटल देना होगा। यदि किसान को छह महीने की कड़ी मेहनत करने के बाद भी बासमती पर प्रति क्विंटल दो हजार रुपये तक फायदा न हुआ तो इसे लगाने का कोई फायदा नहीं।
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