विश्व प्रसिद्ध बासमती की लागत का खर्च भी किसान वसूल नहीं पा रहे। अब तक बासमती का समर्थन मूल्य ही तय नहीं किया गया है। इसकी वजह से किसानों की बासमती कौड़ियों के भाव बिकती है।
जब कभी बासमती की विदेश में मांग तेज हो तो कुछ दाम अच्छे मिल जाते हैं। अन्यथा मिलरों और शैलरों के बनाए दामों पर बासमती बेचनी पड़ती है। अब फिर से बामसती तैयार होने को है।
एक बार फिर किसानों की बासमती का समर्थन मूल्य तय करने की मांग जोर पकड़ गई है। हर किसान की जुबान पर यही सवाल है कि आखिर उनके अच्छे दिन कब आएंगे।