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एकमात्र ऐसा कश्मीरी आतंकी, जिसने जेल से की पीएचडी

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जमायत-उल-मुजाहिदीन (जेएम) का पूर्व कमांडर व अलगाववादी विचाराधारा से प्रेरित आशिक हुसैन फक्तू मानवाधिकार आयोग कार्यकर्ता की हत्या में उम्रकैद की सजा काट रहा है।
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फक्तू एकमात्र ऐसा कश्मीरी आतंकी है जिसने हिरासत में रहने के दौरान पीएचडी की डिग्री हासिल की थी। फक्तू ने वर्ष 1990 में अपने से पांच साल बड़ी अलगाववादी नेता सईदा आसिया अंद्राबी से शादी की थी। इनका बच्चा भी तीन वर्ष तक अपने माता-पिता के साथ जेल में रह चुका है।

कई सालों से जेल में बंद

क्या टाडा के तहत दर्ज इकबालिया बयान के आधार पर किसी को हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा दी जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ इस पहलू पर गौर करेगी।

सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने इस मामले को अब संवैधानिक पीठ के पास भेज दिया है। यह कानूनी मसला जम्मू- कश्मीर में सबसे लंबे समय से जेल में बंद आशिक हुसैन फक्तू के मामले में उठ खड़ा हुआ है।

न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि इस मसले पर विचार करने की जरूरत है। संवैधानिक पीठ यह भी निर्धारित करेगी कि क्या सुप्रीम कोर्ट द्वारा सजा पर मुहर लगाने के बाद फिर से उसकी सजा को लेकर सुनवाई होनी चाहिए या नहीं।
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फक्तू को वर्ष 2001 में जम्मू की अदालत ने बरी कर दिया था

करीब 22 सालों से श्रीनगर सेंट्रल जेल में बंद फक्तू को वर्ष 2001 में जम्मू की अदालत ने बरी कर दिया था, लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को पलट दिया था और फक्तू को दोषी ठहराया था। हालांकि, बाद में शीर्ष अदालत फक्तू की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा पर फिर से विचार करने के लिए तैयार हो गई।

दो सदस्यीय पीठ ने केंद्र सरकार की इस दलील को नकार दिया था कि दोषसिद्धि के आदेश को रिट पीटिशन के द्वारा चुनौती नहीं दी जा सकती।

पीठ ने कहा कि फक्तू की ओर से वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी द्वारा उठाए गए पहलू पर गौर करने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए इसे पुनर्विचार याचिका में तब्दील कर ओपन कोर्ट में सुनवाई करने का निर्णय लिया था।
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