हालांकि, यह परंपरा कुछ लोगों के लिए विवादास्पद भी रही है। कुछ का मानना है कि यह अंधविश्वास है और इसके पीछे कोई वास्तविकता नहीं है। वे इसे पुरानी बात मानते हैं, जबकि दूसरों का कहना है कि यह परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है और इस पर विश्वास रखना लोगों की धार्मिक आस्था का हिस्सा है।
दशहरे के इस उत्सव में भाग लेने वाले लोगों से बात करने पर पता चला कि कई लोग इस परंपरा का पालन करते हुए अपने घरों में जलती हुई लकड़ियों को ले जाने के लिए जोखिम उठाते हैं। उनका मानना है कि यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, और घर में लकड़ी रखने से बुराई समाप्त होती है, जिससे सुख और शांति बनी रहती है।
जम्मू कश्मीर में यह परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है, लेकिन पंजाब जैसे अन्य क्षेत्रों में भी इसे अपनाया जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि त्योहारों का आनंद केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में एकजुटता, सांस्कृतिक पहचान और प्राचीन परंपराओं के संरक्षण का भी माध्यम है।
इस बार का दशहरा न केवल एक धार्मिक उत्सव था, बल्कि यह जम्मू कश्मीर में एक नई दिशा में बढ़ते कदमों का प्रतीक भी था। यह उत्सव न केवल स्थानीय समुदाय के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक संदेश लेकर आया है,शांति, एकता और विकास के पथ पर आगे बढ़ने का।