आज से 63 साल पहले रियासत में सभी सीटों पर नेशनल कांफ्रेंस ने सभी उस समय की 75 सीटों पर निर्विरोध जीत हासिल की थी और 31 अक्तूबर, 1951 को रियासत में शेख अब्दुल्ला प्रधानमंत्री बने थे। इतना लंबा दौर गुजर जाने के बाद अब विधानसभा-2014 में रियासत की सभी विधानसभा सीटों पर बहुकोणीय मुकाबला होता दिख रहा है। नेकां, भाजपा, पीडीपी, कांग्रेस, पैंथर्स और बसपा समेत कई राजनीतिक दल इस बार के चुनावी मैदान में उतरे हैं।
रियासत में वर्ष 1962 में पहले विधानसभा चुनाव हुए थे। इन चुनावों में भी नेशनल कांग्रेस ने बख्शी गुलाम मोहम्मद के नेतृत्व में 70 सीटों पर जीत हासिल की थी। इसके अलावा प्रजा परिषद को तीन और दो सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने कब्जा जमाया था। मार्च 1965 तक रियासत में प्रधानमंत्री का पद होता था, जो कि मार्च 1965 में बदलकर मुख्यमंत्री किया गया।
इस दौरान नेकां के कई नेता कांग्रेस में चले गए और सादिक राज्य के पहले कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री बने।
समझौता हुआ और शेख अब्दुल्ला सीएम बन गए
वर्ष 1967 में हुए विधानसभा चुनाव में सादिक के नेतृत्व में कांग्रेस ने 61 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया। नेकां इन चुनावों में मात्र आठ सीटों तक सीमित रह गई। 12 दिसंबर, 1971 को सादिक का निधन हो गया और उनके स्थान पर सैयद मीर कासिम मुख्यमंत्री बने।
वर्ष 1972 के चुनावों में कासिम के नेतृत्व में कांग्रेस ने 58 सीटें जीतीं और सरकार बनाई। कासिम 25 फरवरी 1975 तक सीएम रहे और इसके बाद इंदिरा-शेख समझौता हुआ और शेख अब्दुल्ला सीएम बन गए, लेकिन कांग्रेस ने शेख को दिया समर्थन वापस ले लिया।
इसके बाद मार्च से नौ जुलाई 1977 तक राष्ट्रपति शासन रहा। वर्ष 1977 के चुनावों में नेकां फिर बड़ी पार्टी बन कर उभरी और शेख सीएम बने। आठ सितंबर 1982 को शेख के निधन के बाद उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला सीएम बने।
हालांकि इस बीच फिर सरकार टूटी और कांग्रेस की मदद से अब्दुल्ला के बहनोई गुलाम मोहम्मद शाह सीएम बन गए।
नेकां को फिर बहुमत मिला और फारूक मुख्यमंत्री बने
बाद में कांग्रेस ने फिर समर्थन वापस लिया और छह मार्च से सात नवंबर 1986 तक राष्ट्रपति शासन रहा। इसके बाद फिर चुनाव हुए और फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बन गए। इसके बाद 1990 को उन्होंने जगमोहन को राज्यपाल बनाने के विरोध में इस्तीफा दिया और 19 नवंबर से 1996 तक राज्य में राष्ट्रपति शासन रहा।
इसके बाद जब चुनाव हुए तो नेकां को फिर बहुमत मिला और फारूक मुख्यमंत्री बने। इस दौरान बीच में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन भी रहा। जब नये चुनाव हुए तो राज्य में नई पार्टी बनी पीडीपी के संरक्षक मुफ्ती मोहम्मद सईद पहले गैर नेकां-कांग्रेस मुख्यमंत्री बने।
पीडीपी ने तीन साल तक राज किया और कांग्रेस ने जब गुलाम नबी आजाद को मुख्यमंत्री बनाया और पीडीपी ने आजाद सरकार से बीच में समर्थन वापस ले लिया।
इस बार कोई भी दल उलटफेर करने में सक्षम
इसके बाद अमरनाथ भूमि विवाद के चलते राज्य में 11 जुलाई, 2008 को फिर से राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। 2008 में एक बार फिर से रियासत में चुनाव हुए। इन चुनावों में किसी को बहुमत हासिल तो नहीं हुआ, लेकिन 5 जनवरी 2009 को नेकां 28 सीटें हासिल कर बड़ी पार्टी बनी और कांग्रेस के समर्थन से उमर अब्दुल्ला की सरकार बनी।
हालांकि इन चुनावों में पीडीपी 21 सीटों के साथ दूसरे, कांग्रेस 17 सीटों के साथ तीसरे और भाजपा ने भी बढ़िया प्रदर्शन करते हुए पहली बार रियासत में 11 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की। इस बार चुनावों में कोई भी दल उलटफेर करने में सक्षम है। सभी सीटों पर बहुकोणीय मुकाबलों के आसार हैं।