जम्मू-कश्मीर की बेटियां राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। खेल, प्रतियोगी परीक्षाएं और देश सेवा से लेकर फैशन तक की दुनिया में खुद को साबित करते हुए प्रदेश व देश का नाम रोशन कर रही हैं। वह दूसरों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी कर रही हैं। 2023 में जम्मू-कश्मीर लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित जम्मू और कश्मीर संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा में 33 फीसदी बेटियां सफल रहीं हैं।
सिल्वर चीता ट्रॉफी जीत हंसजा बनीं पहली महिला अधिकारी
24 साल की आयु में कठोर शारीरिक व मानसिक यात्रा तय कर जम्मू की बेटी कैप्टन हंसजा शर्मा ने सिल्वर चीता ट्रॉफी जीत कर पहली महिला अधिकारी बनने का गौरव हासिल किया है। कैप्टन हंसजा को काम्बैड एविएटर्स कोर्स में नंबर 40 में टॉप करने के लिए इस ट्राॅफी से सम्मानित किया गया था। 2019 में सेना में लेफ्टिनेंट के रूप में नियुक्त हुई हंसजा आज प्रदेश की लड़कियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी हैं।
कश्मीर की दो बहनों ने स्टार्स इंटरनेशनल वुशू चैंपियनशिप में बनाया स्थान
खेलों में भी प्रदेश की बेटियां चमक बिखेर रही हैं। वुशू खिलाड़ी आयीरा चिश्ती और अंसा चिश्ती ने अपनी प्रतिभा से इसे साबित भी किया है। 22वीं जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में दोनों बहनों ने स्वर्ण और रजत पदक जीता था। ईरान के तेहरान में अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर प्रशिक्षण शिविर में भाग लेने वाली 17 सदस्यीय भारतीय वुशू टीम में शामिल थीं। अब दोनों 28 फरवरी से पांच मार्च तक रूस में होने जा रही मॉस्को स्टार्स इंटरनेशनल वुशू चैंपियनशिप में देश का प्रतिनिधित्व करेंगी। इस प्रतियोगिता में 30 से अधिक देशों के खिलाड़ी भाग ले रहे हैं। 22 जनवरी को चेन्नई में हुए चयन ट्रायल में आयरा और अंसा ने ट्रॉयल के दौरान असाधारण कौशल का प्रदर्शन कर इसमें अपना स्थान पक्का किया।
बिना बाजू सोने पर साधा निशाना, शीतल बनीं प्रदेश की पहली अर्जुन अवार्डी
किश्तवाड़ के दूरदराज के गांव लोई धार में गरीब परिवार में जन्मीं तीरंदाज शीतल देवी(16) ने वो मुकाम हासिल किया है, जिसे हासिल करने में कई साल लग जाते हैं। शीतल ने 2022 में चीन के हांगझाऊ में हुए एशियाई पैरा खेलों में न सिर्फ दो स्वर्ण समेत तीन मेडल जीतकर इतिहास रचा, बल्कि अर्जुन अवार्ड पाने वाली जम्मू-कश्मीर की पहली खिलाड़ी भी बनीं। फोकोमेलिया नाम की बीमारी से पीड़ित शीतल ने बिना बाजू के छाती के सहारे दांतों और पैरों से तीरंदाजी का अभ्यास कर अपनी मंजिल को हासिल किया है।
राष्ट्रीय बालिका दिवस का इतिहास
प्रतिवर्ष 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाते हैं। इस दिन को मनाने की शुरुआत साल 2008 से हुई। पहली बार महिला बाल विकास मंत्रालय ने 24 जनवरी 2008 में राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया था। 24 जनवरी के दिन मनाने की खास वजह है। इस दिन इंदिरा गांधी ने 1966 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। उनके इस सर्वोच्च पद तक पहुंचने को उपलब्धि के रूप में प्रतिवर्ष याद करने और महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए जागरूक करने के उद्देश्य से 24 जनवरी का दिन महत्वपूर्ण माना गया।